Sunday, 23 February 2014

*बुरा न बोलो बोल रे.*

*बुरा न बोलो बोल रे.*
...आनन्द विश्वास
बुरा न देखो,  बुरा सुनो ना,  बुरा न बोलो बोल रे,
वाणी में मिसरी तो घोलो,  बोल-बोल को तोल रे।
मानव  मर जाता है लेकिन,
शब्द  कभी  ना   मरता  है।
शब्द-बाण से आहत मन का,
घाव  कभी  ना   भरता  है।
सौ-सौ बार सोच कर बोलो, बात यही अनमोल रे,
बुरा न देखो,  बुरा सुनो ना,  बुरा न बोलो बोल रे।
पांचाली  के  शब्द-बाण से,
कुरूक्षेत्र   रंग  लाल  हुआ।
जंगल-जंगल  भटके पांडव,
चीरहरण, क्या हाल  हुआ।
बोल सको तो अच्छा  बोलो, वर्ना मुँह मत खोल रे,
बुरा न देखो,  बुरा सुनो ना,  बुरा न बोलो बोल रे।
जो   देखोगे   और   सुनोगे,
वैसा  ही  मन  हो जायेगा।
अच्छी  बातें, अच्छा दर्शन,
जीवन  निर्मल  हो जायेगा।
अच्छा मन, सबसे अच्छा धन, मनवा जरा टटोल रे,
बुरा न देखो,  बुरा सुनो ना,  बुरा न बोलो बोल रे।
कोयल  बोले  मीठी वाणी,
कानों   में   रस   घोले  है।
पिहु-पिहु मन मोर नाचता,
सबके   मन   को  मोहे  है।
खट्टी अमियाँ  खाकर मिट्ठू,  मीठा-मीठा  बोल  रे।
बुरा न देखो,  बुरा सुनो ना,  बुरा न बोलो बोल रे।
*****

(काव्य-माधुरी संस्थान कनाडा द्वारा आयोजित 
कवि-सम्मेलन में श्री सुरेन्द्र पाठक जी 
द्वारा किया गया मेरी कविता 
*बुरा न बोलो बोल रे* 
का काव्य-पाठ।) 



...आनन्द विश्वास

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