Tuesday, 1 January 2019

पीछे मुड़कर कभी न देखो

पीछे मुड़कर कभी न देखो
..आनन्द विश्वास
पीछे  मुड़कर कभी न  देखो, आगे ही तुम  बढ़ते जाना।
उज्ज्वल कल है तुम्हें बनाना, वर्तमान ना व्यर्थ गँवाना।
संघर्ष आज तुमको करना है,
महनत में  तुमको  खपना है।
दिन और रात  तुम्हारे अपने,
कठिन  परिश्रम  में तपना है।
फौलादी आशाऐं लेकर, तुम  लक्ष्य प्राप्त करते जाना।
पीछे मुड़कर कभी न देखो, आगे ही तुम बढ़ते जाना।
इक-इक पल है बड़ा कीमती,
गया समय वापस ना आता।
रहते  समय  न जागे तुम तो,
जीवन  भर  रोना  रह जाता।
सत्यवचन सबको खलता है,मुश्किल है सच को सुन पाना।
पीछे  मुड़कर  कभी न  देखो, आगे  ही तुम  बढ़ते जाना।
बीहड़  बीयावान  डगर  पर,
कदम-कदम पर शूल मिलेंगे।
इस  छलिया  माया  नगरी में,
अपने  ही  प्रतिकूल  मिलेंगे।
गैरों की तो बात छोड़ दो, अपनों  से मुश्किल  बच पाना।
पीछे  मुड़कर कभी न  देखो, आगे  ही  तुम  बढ़ते जाना।
झंझावाती  प्रबल  पवन  हो,
तुमको  कहीं  नहीं रुकना है।
बाधाऐं  हों   सिर  पर हावी,
फिर भी तुम्हें नहीं झुकना है।
मन में  दृढ़  विश्वास  लिए, संकल्प  सिद्ध  करते जाना।
पीछे  मुड़कर कभी न  देखो, आगे ही तुम  बढ़ते जाना।
नदियाँ  कब   पीछे  मुड़तीं हैं,
कल-कल करतीं आगे बढ़तीं।
समय-चक्र  आगे  ही  बढ़ता,
घड़ी कहाँ कब उल्टी चलतीं।
पल-पल बदल रहा है सब कुछ,संग समय के चलते जाना। 
पीछे  मुड़कर  कभी न  देखो, आगे  ही  तुम  बढ़ते जाना।
...आनन्द विश्वास


Sunday, 11 February 2018

*बेटी-युग*

सतयुग, त्रेता, द्वापर बीता, बीता कलयुग कब का,
बेटी  युग  के  नए  दौर  में,  हर्षाया   हर   तबका।
बेटी-युग में खुशी-खुशी है,
पर महनत के साथ बसी है।
शुद्ध-कर्म  निष्ठा का संगम,
सबके मन में दिव्य हँसी है।
नई  सोच  है,  नई चेतना, बदला  जीवन  सबका,
बेटी  युग  के  नए  दौर  में,   हर्षाया   हर  तबका।
इस युग में  ना  परदा बुरका,
ना तलाक, ना गर्भ-परिक्षण।
बेटा   बेटी,    सब   जन्मेंगे,
सबका   होगा  पूरा   रक्षण।
बेटी की किलकारी सुनने, लालायित मन सबका।
बेटी-युग  के  नए  दौर  में,   हर्षाया   हर  तबका।
बेटी भार  नहीं  इस  युग में,
बेटी   है  आधी   आबादी।
बेटा है कुल का दीपक, तो,
बेटी है दो  कुल की  थाती।
बेटी तो  है शक्ति-स्वरूपा, दिव्य-रूप है  रब  का।
बेटी-युग  के  नए  दौर  में,   हर्षाया   हर   तबका।
चौके   चूल्हे  वाली  बेटी,
बेटी-युग में कहीं  न होगी।
चाँद  सितारों से  आगे जा,
मंगल पर मंगलमय  होगी।
प्रगति-पंथ पर  दौड़ रहा है,  प्राणी हर मज़हब का।
बेटी  युग  के  नए  दौर  में,  हर्षाया   हर   तबका।
***
...आनन्द विश्वास

Friday, 29 December 2017

Thursday, 31 August 2017

छूमन्तर मैं कहूँ...

छूमन्तर मैं कहूँ और फिर,
जो चाहूँ बन जाऊँ।
काश, कभी पाशा अंकल सा,
जादू मैं कर पाऊँ।

हाथी को मैं कर दूँ गायब,
चींटी उसे बनाऊँ।
मछली में दो पंख लगाकर,
नभ में उसे उड़ाऊँ।

और कभी खुद चिड़िया बनकर,
फुदक-फुदक उड़ जाऊँ।
रंग-बिरंगी तितली बनकर,
फूली नहीं समाऊँ।

प्यारी कोयल बनकर कुहुकूँ,
गीत मधुर मैं गाऊँ।
बन जाऊँ मैं मोर और फिर,
नाँचूँ, मेघ बुलाऊँ।

चाँद सितारों के संग खेलूँ,
घर पर उन्हें बुलाऊँ।
सूरज दादा के पग छूकर,
धन्य-धन्य हो जाऊँ।

अपने घर को, गली नगर को,
कचरा-मुक्त बनाऊँ।
पर्यावरण शुद्ध करने को,
अनगिन वृक्ष लगाऊँ।

गंगा की अविरल धारा को,
पल में स्वच्छ बनाऊँ।
हरी-भरी धरती हो जाए,
चुटकी अगर बजाऊँ।

पर जादू तो केवल धोखा,
कैसे सच कर पाऊँ।
अपने मन की व्यथा-कथा को,
कैसे किसे सुनाऊँ।
*** 
आनन्द विश्वास

Thursday, 17 August 2017

*पाँच-सात-पाँच*

*पाँच-सात-पाँच*
(कुछ हाइकु) 
1. 
हमने माना
पानी नहीं बहाना
तुम भी मानो।
2.
छेड़ोगो तुम
अगर प्रकृति को
तो भुगतोगे।
3.
जल-जंजाल
न बने जीवन का
जरा विचारो।
4.
सूखा ही सूखा
क्यों है चारों ओर
सोचो तो सही।
5.
पानी या खून
हर बूँद अमूल्य
मत बहाओ।
 6.
खून नसों में
बहता अच्छा, नहीं
सड़क पर।
7.
सुनो सब की
सोचो समझो और
करो मन की
8.
घड़ी की सुईं
चलकर कहती
चलते रहो।
9.
रोना हँसना
बोलो कौन सिखाता
खुद आ जाता।
10.
सूखा ही सूखा
प्यासा मन तरसा
हुआ उदासा।
11.
भ्रष्टाचार से
देश को बचाएंगे
संकल्प करें।
12.
आतंकवाद
समूल मिटाना है
मन में ठानें।
13.
नैतिक मूल्य
होते हैं सर्वोपरि
मन से मानें।
14.
गेंहूँ जौ चना
कैसे हो और घना
हमें सोचना।
15.
मन की बात
सोचो, समझो और
मनन करो।
16.
देश बढ़ेगा
अपने दम पर
आगे ही आगे।
17.
अपना घर
तन-मन-धन से
स्वच्छ बनाएं।
18.
विद्या मन्दिर
नारों का अखाड़ा है
ये नज़ारा है।
19.
सब के सब
एक को हटाने में
एक मत हैं।
20.
पहरेदार
हटे, तो काम बने
हम सब का।
21.
नहीं सुहाते
हमको दोनों घर
बिन कुर्सी के।
22.
नारी सुरक्षा
आकाश हुआ मौन
मत चिल्लाओ।
23.
सूखा ही सूखा
बादल हैं लाचार
रोती धरती
24.
दीप तो जले
उजाला नहीं हुआ
दीप के तले।
25.
जागते रहो
कह कर, सो गया
पहरेदार।
...आनन्द विश्वास

Friday, 28 October 2016

*इस बार दिवाली सीमा पर*



इस बार दिवाली सीमा पर,
है खड़ा  मवाली  सीमा पर।
इसको  अब  सीधा करना है,
इसको अब  नहीं सुधरना है।
इनके  मुण्डों  को  काट-काट,
कचरे के संग फिर लगा आग।
गिन-गिन कर बदला लेना है,
हम  कूँच  करेंगे  सीमा  पर।
ये  पाक  नहीं,  ना पाकी  है,
चीनी, मिसरी-सा  साथी है।
दोनों की  नीयत  साफ नहीं,
अब करना इनको माफ नहीं।
इनकी  औकात   बताने  को,
हम, चलो  चलेंगे सीमा पर।
दो-चार  लकीरें   नक्शे  की,
बस  हमको  जरा बदलना है।
भूगोल  बदलना   है   हमको,
इतिहास स्वयं लिख जाना है।
आतातायी का  कर  विनाश,
फिर धूम-धड़ाका सीमा पर।
...आनन्द विश्वास