Friday, 11 September 2015

आरती का आकाश-भ्रमण

आरती का आकाश-भ्रमण
यह कहानी मेरे बाल उपन्यास
बहादुर बेटी
से ली गई है।
...आनन्द विश्वास
स्कूल की पढ़ाई और होम-वर्क पूरा करने के बाद आरती यूँ तो अक्सर अपने मित्रों के साथ सोसायटी के कम्पाउण्ड में ही थोड़ा बहुत साइकिल चला लिया करती थी या फिर अपने साथियों के साथ कोई छोटे-मोटे खेल, खेल लिया करती थी।
पर आज उसका मन कुछ उदास था अतः उसने आकाश में भ्रमण करने का मन बनाया। इस विषय में और अधिक जानकारी लेने के लिये उसने रॉनली से परामर्श करना उचित समझा।
उसने अपने पास में रखे हुये सिक्के को ऐक्टीवेट किया और फिर उसके लाल बटन दबाकर रॉनली से सम्पर्क किया। सामने से आवाज आई-बोलो आरती, कैसा है। सब कुछ ठीक-ठाक है ना।
हाँ रॉनली, सब कुछ ठीक है अपने हाल-चाल सुनाओ। मेरा आज आकाश में भ्रमण करने का मन कर रहा है। इसके लिये मुझे क्या करना होगा।आरती ने रॉनली से पूछा।
आरती, तुम अपनी ऐनी ऐंजल को ऐक्टीवेट करलो और उसे अपने साथ में सूक्ष्म अदृश्य रूप में रख लेना। वह तुम्हारा पूरा मार्गदर्शन करती रहेगी। चिन्ता की कोई बात नहीं है।रॉनली ने आरती को परामर्श दिया।
ठीक है, रॉनली। अब मैं आकाश-भ्रमण से लौटकर आने के बाद अपने अनुभव तुम्हारे साथ शेयर करूँगी। आरती ने कहा।
इसके बाद आरती ने ऐंजल ऐनी के सीधे हाथ के अँगूठे को अपने सीधे हाथ के अँगूठे से स्पर्श करके उसे ऐक्टीवेट कर लिया और उसे अपने आकाश-भ्रमण की इच्छा बता दी।
ऐनी ऐंजल ने कुछ ही क्षणों में आकाश-भ्रमण की सम्पूर्ण व्यवस्था करके आरती से कहा-चलो आरती, अब हम अपने इस बाल-यान में बैठकर आकाश-भ्रमण करने के लिए चल सकते हैं। यह बाल-यान हमें सम्पूर्ण ब्रह्मांड का भ्रमण कराने में समर्थ है। 
और ऐसा कहते ही फूलों से सजा हुआ एक सुन्दर बाल-यान आरती के सामने आ गया। आरती बाल-यान में बैठने ही जा रही थी कि दरवाजे पर डोरबैल बजी। मम्मी ने दरवाजा खोला तो उन्होंने अपने सामने मानसी को खड़ा हुआ पाया, जो आरती को खेलने के लिये बुलाने आई थी। आरती को कहीं जाते हुये देखकर मानसी ने आरती से पूछा-आरती, तारे कईं जवानुँ छे, खरो।
 “हाँ मानसी, आज मेरा मन कुछ उदास हो रहा है अतः मैं आकाश में भ्रमण करने के लिए जाना चाहती हूँ। आरती ने कहा।
आरती, हूँ पण तारी साथे कम्पनी आपूँ तो सारो रहशे न। मानसी ने भी आकाश में भ्रमण करने की अपनी इच्छा जताई।
वैसे तो आरती अकेले ही आकाश-भ्रमण करने के लिये जाना चाहती थी पर वह मानसी के आग्रह को न टाल सकी। उसके मन में विचार आया कि अब क्यों न हम शर्लिन, सार्थक और भास्कर को भी अपने साथ ले चलें, तो कितना अच्छा रहेगा।
अतः आरती ने मानसी से कहा-हाँ मानसी, अगर तुम्हारी इच्छा है तो तुम भी हमारे साथ चल सकते हो। तो फिर ऐसा करते हैं कि शर्लिन, सार्थक और भास्कर को भी बुला लेते हैं। वे सब भी अगर अपने साथ चलेंगे तो और भी अच्छा रहेगा।
सरस, बहु मज़ा आवसे आरती। मानसी ने खुश होकर कहा।
मानसी, तुम शर्लिन, सार्थक और भास्कर से सम्पर्क कर लो और यदि उनकी भी इच्छा हो तो उन्हें भी बुला लाओ। आरती ने मानसी से निवेदन किया। 
और कुछ ही समय के अन्दर मानसी, शर्लिन, सार्थक और भास्कर तैयार होकर आरती के पास आकाश में भ्रमण करने के लिये आ चुके थे। 
ऐनी ऐंजल की ओर देखकर आरती कुछ कहने ही जा रही थी, तब तक तो ऐनी ऐंजल ने आरती से हँसते हुए कहा-आरती, इस बाल-यान में जगह की कोई चिन्ता मत करो, आवश्यकता के अनुसार इस बाल-यान का आकार अपने आप बढ़ता-घटता रहता है। इसमें तो हजारों बच्चे एक साथ बैठकर भ्रमण कर सकते हैं।
अरे वाह, तब तो बहुत ही अच्छा है ये बाल-यान। आरती को आश्चर्य भी हुआ और खुशी भी हुई।
शर्लिन, सार्थक और भास्कर ने तो ऐनी ऐंजल को पहली बार ही देखा था। ऐंजल से परिचय कर बच्चों को अच्छा भी लगा और आश्चर्य भी हुआ। साथ ही, आरती के साथ आकाश में भ्रमण करने को लेकर मानसी, शर्लिन, सार्थक और भास्कर को रोमांच भी हो रहा था और मन में गुदगुदी भी हो रही थी।
कुछ ही समय में आरती के सभी मित्र बाल-यान में बैठ चुके थे और अब वे आकाश मार्ग की ओर जाने के लिये तैयार थे।
ऐंजल ने बाल-यान के चारों ओर अदृश्य पारदर्शी आवरण बना दिया था जिस पर कि बाहरी वायु-मण्डल का कोई भी प्रभाव न पड़े और सभी लोग पूर्ण रूप से सुरक्षित बने रहें।   
शर्लिन और भास्कर की इच्छा पहले धरती पर ही भ्रमण करने की थी। मसलन वे देखना चाहते थे कि धरती से कुछ ऊँचाई पर पहुँचकर अपनी सोसायटी कैसी दिखाई देती है, अपना स्कूल कैसा दिखाई देता है, बाज़ार और शहर कैसे दिखाई देते हैं और बड़े-बड़े ऊँचे-ऊँचे बहु-मंज़िला मकान कैसे दिखाई देते हैं। सड़क पर चलते हुये आदमी, कार और बस कैसे दिखाई देते हैं। 
उन्होंने सुना था कि ऊपर से देखने पर आदमी बिलकुल चींटी जैसे छोटे-छोटे दिखाई देते हैं और सोसायटी, घर, बाज़ार, सड़क सब कुछ तो ड्राइंग-पेपर पर बनी हुई ड्राइंग जैसे दिखाई देते हैं। ज्यादा ऊपर जाने पर तो पक्षी भी दिखाई नहीं देते हैं। वहाँ पर तो सिर्फ बादल ही बादल दिखाई देते हैं और सिर्फ बादलों को देखने में उनकी कोई उत्सुकता या जिज्ञासा नहीं थी। अतः उनकी इच्छा धरती से कुछ ही ऊँचाई से धरती का नज़ारा देखने की थी।
पर संकोच-वश वे कुछ भी न कह सके और उन्होंने अपने मन की बात को मन में रखना ही उचित समझा।
लेकिन ऐनी ऐंजल को उनके मन की बात समझने में जरा भी देर न लगी अतः उसने भास्कर, मानसी और शर्लिन की ओर देखा और फिर मुस्कुराते हुए कहा-भास्कर, क्यों न हम लोग सबसे पहले धरती से कुछ ही ऊँचाई पर पहुँचकर धरती के मनोरम और सुन्दर दृश्यों का अवलोकन करें, तो कैसा रहेगा।
भास्कर भी तो यही चाहता था। वह अपने मन की इच्छा को पूरा होते हुए देखकर खुशी के मारे उछल ही पड़ा और उत्साहित होकर बोला-हाँ बिलकुल ठीक रहेगा और मजा भी आएगा।
शर्लिन और सार्थक ने भी भास्कर की बात का समर्थन किया। आरती और मानसी को भी यह प्रस्ताव उचित लगा।
कुछ ही समय में इनका बाल-यान घर के बाहर निकल आया। पर ये क्या, घर का दरवाजा खोले बिना ही ये सब लोग दीवार के पार निकल आये। दरवाज़ा और दीवार, सब कुछ तो इनके लिये पार-दर्शी भी थे और उसके आर-पार ये लोग आसानी से आ जा भी सकते थे। दीवार, पेड़ और बिल्डिंग, सब कुछ इनके लिये कोई रुकावट नहीं थे। सभी कुछ तो पार-दर्शी था अब इनके लिये।
और अब इन बच्चों का बाल-यान सोसायटी के गार्डन के ऊपर था। सोसायटी के गार्डन में कुछ बच्चे खेल रहे थे, कुछ झूले खाली पड़े थे और कुछ लोग लॉन में बैठे हुये थे।
गेट से आती हुई कार बच्चों के खिलौने वाली कार जैसी दिख रही थी जो धीरे-धीरे रेंगती हुई सोसायटी के मेन गेट से प्रवेश कर रही थी। सबसे अधिक मजे की बात तो ये थी कि ये सभी बच्चे अपने-अपने घरों को देख रहे थे और घर का कौन-सा सदस्य क्या कर रहा है ये जानने का प्रयास कर रहे थे।
आरती का बाल-यान अब उनके स्कूल के ऊपर था। स्कूल की छुट्टी होने के कारण चहल-पहल तो न के बराबर ही थी पर स्कूल के गेट के सामने सीताराम हलवाई की दुकान पर तो भीड़ आज भी उतनी ही थी। स्कूल की छुट्टी का उसके ऊपर कोई विशेष प्रभाव नही था। वह ताजा-ताजा गरमागरम समोसे बना रहा था। जलेबी और फाफड़ा तो वह पहले ही तैयार कर चुका था।
गरमागरम समोसे और जलेबी हों और बच्चों का मन काबू में रह सके, ऐसा तो कभी सोचा भी नहीं जा सकता। समोसों को देखकर मानसी का बाल-मन बोल ही पड़ा-जोओ, केटला सरस गरमागरम समोसा छे। मने तो समोसा बहु फाबे छे अने फाफड़ा, जलेबी पण। आरती, चालो आपणे बद्धा खावा माटे चलिये।
आरती और सार्थक को हँसी भी आई और अच्छा भी लगा। बाल-संसद में यह प्रस्ताव सर्व-सम्मति से पारित हो गया। विरोध का तो कोई प्रश्न हीं नही था। सभी बच्चों का मन था कि सीताराम हलवाई की दुकान से नाश्ता लेकर उसे पैक करा लिया जाय और फिर ऊपर आकाश में बादलों के बीच पहुँचकर नाश्ता करने का आनन्द लिया जाय, तो कितना अच्छा रहेगा।
आरती के दिशा-निर्देश से ऐंजल ने बाल-यान को सीताराम हलवाई की दुकान से कुछ दूर सुरक्षित स्थान पर उतार लिया, पर यह बाल-यान अभी भी अन्य सभी लोगों के लिये तो अदृश्य ही था और बाल-यान में बैठे हुए सभी बालक भी।
सभी बच्चों ने अपने पास के पॉकेट-मनी के पैसे इकठ्ठे करके, भास्कर और मानसी को नाश्ता लाने के लिये भेज दिया।
बाल-यान से उतरते ही भास्कर और मानसी दोनों, सभी लोगों के लिये दृश्य हो गये थे। अब कुछ ही समय में भास्कर और मानसी सीताराम हलवाई की दुकान पर पहुँच चुके थे।
सीताराम हलवाई की दुकान से नाश्ता पैक कराने के बाद भास्कर और मानसी को सड़क पार करते हुए तो वहाँ पर मौजूद सभी लोगों ने देखा था पर बाल-यान में बैठते ही दोनों बालकों को वे लोग न देख सके। क्योंकि वे बाल-यान में प्रवेश करते ही अदृश्य हो गये थे।
वहाँ उपस्थित सभी लोग कुछ भी न समझ सके। बच्चों का अचानक उनकी आँखों के सामने से ओझल हो जाना, सभी के बीच चर्चा का विषय बनकर रह गया। लोगों ने इधर-उधर देखा भी, ढूँढ़ा भी पर कुछ भी पता न चल सका और ना ही बाल-यान के विषय में किसी को कोई जानकारी हो मिल सकी।
बाल-यान आकाश में ऊपर की ओर गति कर रहा था। तभी बालकों को छोटी-छोटी चिड़ियों का एक झुण्ड बाल-यान की ओर आता हुआ दिखाई दिया। शर्लिन को लगा कि ये छोटी-छोटी चिड़ियाँ तो बाल-यान से टकरा कर मर ही जाऐंगी। उसने जल्दी से ऐनी ऐंजल से कहा-ऐंजल बचाओ, जल्दी से बचाओ, अपने बाल-यान को। देखो तो सही अपना बाल-यान सामने से आती हुई चिड़ियों के झुण्ड से टकराने वाला है और देखो तो सही बेचारी निर्दोष चिड़ियाँ तो मर ही जाऐंगी।
 “नहीं शर्लिन, ऐसा कुछ भी नहीं होगा। हमारा बाल-यान, हम और सभी चिड़ियाँ पूर्णरूप से सुरक्षित हैं। अभी हम सब लोग पार-दर्शी रूप में हैं अतः ये सभी चिड़ियाँ हमारे शरीर से आर-पार होती हुई निकलकर चली जाऐंगी। किसी को कोई भी अहित या नुकसान नहीं होगा। ऐनी ऐंजल ने शर्लिन को समझाया।
और कुछ ही देर में चिड़ियों का विशाल झुण्ड बाल-यान के आर-पार निकलकर चला गया। सभी बच्चों के मन में गुदगुदी भी हुई और उन्हें मज़ा भी आया। बस सभी को ऐसा महसूस हुआ कि कोई छाया-सी गति कर रही है और चिड़ियों को तो पता चलने का कोई प्रश्न ही नहीं था।
और ऐसा ही एक बार फिर से हुआ। जब एक विशालकाय ड्रीमलाइनर विमान बाल-यान की ओर बढ़ा चला आ रहा था। सामने से आते हुए ड्रीमलाइनर विमान को देखकर, बच्चों के मन में एक गुदगुदी सी होने लगी। और जैसे ही विमान बाल-यान से पसार होते हुए निकला, सभी बच्चों के अन्दर फुरफुरी सी होने लगी, साथ ही सभी बच्चों को बड़ा मजा भी आया।
अब तो बाल-मन में आतुरता थी, यह जानने की, कि कैसा होता है हवाई जहाज अन्दर से, कैसी होती हैं उसकी सीट-बैल्ट और कैसी होतीं हैं एयर होस्टेज और उनका विनम्र आचरण।  
क्या हम सभी लोग हवाई जहाज के अन्दर जाकर सब कुछ देख सकते हैं, ऐनी। आरती ने ऐनी ऐंजल से जानना चाहा। 
हाँ आरती, हवाई जहाज के अन्दर जाकर सब कुछ देखा तो जा सकता है पर हम वहाँ सीटों पर नहीं बैठ सकेंगे। क्योंकि पहले तो वे सीटें खाली ही नहीं होंगी और खाली हों तब भी, जब हमने विमान का टिकट ही नहीं लिया है तो फिर हमारा उन सीटों पर बैठना अनुचित होगा और यह व्यवहारिक भी नहीं रहेगा। ऐनी ऐंजल ने आरती को समझाया।
पर आरती के कुछ भी कहने से पहले ही शर्लिन ने अपने मन की बात को स्पष्ट करते हुए कहा-हाँ ऐनी, कोई बात नहीं है। हम सभी खड़े-खड़े ही अन्दर का दृश्य देख लेंगे और बहुत ही जल्दी बाहर आ जाऐंगे। किसी को कोई परेशानी भी नहीं होने देंगे।
और इतनी देर में तो तेज गति से आता हुआ ड्रीमलाइनर विमान बाल-यान से पसार होकर काफी दूर तक जा चुका था।
ड्रीमलाइनर विमान को अत्यन्त तेज गति से दूर तक जाते हुए देखकर भास्कर ने उदास मन से कहा-अब तो जहाज बहुत दूर निकल चुका है। अब तो उसके पास तक पहुँच पाना या उसे अन्दर से देख पाना हम सबके लिए सम्भव ही नहीं हो सकेगा। 
नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है, भास्कर। अपने इस बाल-यान की गति उस ड्रीमलाइनर विमान की गति से कई हजार गुनी अधिक होती है। अपना बाल-यान तो मन की गति से भी तेज गति से गति करता है। हमें उस ड्रीमलाइनर के पास तक पहुँचने में पल भर भी नहीं लगेगा। ऐनी ऐंजल ने भास्कर को बताया।
और कुछ ही क्षणों में सभी बच्चे ऐनी ऐंजल के साथ अदृश्य रूप में  ड्रीमलाइनर विमान के अन्दर प्रवेश कर चुके थे। पर ये क्या, ड्रीमलाइनर विमान के अन्दर के भयंकर दृश्य को देखकर तो सभी बच्चे और ऐनी ऐंजल हैरान ही रह गये। 
ड्रीमलाइनर विमान में एक आदमी एके 47 राइफल लिए हुए विमान के आगे के भाग में खड़ा हुआ था और दूसरा आदमी अनेक आधुनिक हथियारों से लैस होकर विमान के पीछे के भाग में खड़ा हुआ था। तीसरा आदमी विमान के कॉकपिट में महिला पायलेट की कनपटी पर एके 47 लगाए हुए था और उसे अपनी इच्छा के अनुसार विमान को ले जाने के दिशा-निर्देश दे रहा था। दोनों एयर-हॉस्टेज रस्सी से बंधी हुई विमान के पीछे के भाग में पड़ी हुईं थीं। कुल तीन आदमी थे हाईजैकर आतंकवादी।
ड्रीमलाइनर विमान हाई-जैक हो चुका था। आतंकवादियों ने विमान को हाई-जैक कर लिया था। सामने खड़े हुए आतंकवादी ने यात्रियों को सम्बोधित करते हुए कहा-आपका प्लेन हाई-जैक हो चुका है। कोई भी यात्री अपनी सीट से जरा भी हिलने की कोशिश न करे और सभी यात्री अपनी आँखें बन्द करके अपनी सीट पर ही बैठे रहें वर्ना उन्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा।
विमान के हाई-जैक होने की सूचना भी एयरपोर्ट अथॉरिटीज़ तक पहुँचा दी गई थी। हाईजैकर आतंकवादियों ने अपनी माँग भी सरकार के सामने रख दीं थी। सरकार की ओर से भी समस्या का हल ढ़ूँढने के प्रयास जारी थे। कैबिनिट की आपातकालीन बैठक भी बुलाई गई थी।
जब आरती और उसके अन्य साथियों को पता चला कि इस ड्रीमलाइनर विमान में तो देश के प्रधानमंत्री और एक उच्च-स्तरीय प्रतिनिधि मण्डल भी यात्रा कर रहा है। तब तो समस्या और भी अधिक गम्भीर हो गई थी। अब तो आरती के सामने यह ज्वलन्त समस्या थी कि वह किस प्रकार से इस ड्रीमलाइनर विमान को हाईजैकर आतंकवादियों से मुक्त कराए।
तब आरती ने ऐनी ऐंजल से पूछा-ऐनी, मुसीबत में फंसे हुए पीएम और उच्च-स्तरीय प्रतिनिधि मण्डल के साथ ड्रीमलाइनर विमान को हम इन हाईजैकर आतंकवादियों से कैसे मुक्त करा सकते हैं। क्या यह सम्भव है।
हाँ सब कुछ सम्भव है, हम सब मिलकर क्या नहीं कर सकते हैं। असम्भव शब्द तो हमारे शब्द-कोश में है ही नहीं। हमारे लिए कुछ भी असम्भव नही है। ऐनी ऐंजल ने कहा।
तो फिर ऐनी, इन हाईजैकर्स से ड्रीमलाइनर को मुक्त कराने के लिये हमें क्या करना होगा। आरती ने ऐनी ऐंजल से पूछा।
आरती, हाँलाकि रॉनली ने तुम्हें नहीं बताया है फिर भी मैं तुम्हें बताती हूँ कि तुम अपने चमत्कारी सिक्के को एक्टीवेट करके यदि उसके हरे बटन को दबाओगे, तो तुम्हें जिस भी चीज की आवश्यकता होगी, तुम उसे मँगा सकते हो। हरे बटन को दबाकर तुम नीटा-रेज़ (नीटा-किरणों) की पिस्टल मँगा लो। इस पिस्टल की गोली में नीटा-रेज़ होती हैं जिसकी गोली लगने से आदमी मरता नहीं है केवल बेहोश हो जाता है और आठ-दस घण्टे तक उसे होश नहीं आ सकता है। यह पिस्टल तुम्हारे लिए उपयोगी हो सकेगी। ऐनी ऐंजल ने आरती को सुझाया।
पिस्टल से मुझे क्या करना होगा, ऐनी। आरती ने पूछा।
आरती, मैं तुम्हें तीनों आतंकवादियों से अदृश्य कर दूँगी। तब तुम विमान में पीछे के भाग में खड़े हुए आतंकवादी को गोली मार देना और साथ में एक घूँसा भी मार देना। इससे विमान के यात्री यह समझेंगे कि इस लड़की के घूँसा लगने से आतंकवादी बेहोश हो गया है। ऐसे ही आगे खड़े हुए आतंकवादी को भी तुम बेहोश कर देना। अन्त में विमान की केबिन में जाकर तीसरे आतंकवादी को भी गोली मारकर बेहोश कर देना। इसके बाद तुम विमान में यात्रा कर रहे दो-तीन नव युवकों की सहायता से उन एयर होस्टेज की रस्सी खुलवा देना, जिन्हें कि आतंकवादियों ने बाँधकर विमान के पीछे के भाग में डाला हुआ है। फिर उन्हीं रस्सियों से तुम तीनों आतंकवादियों को बँधवा देना। बाकी के सभी काम एयर होस्टेज, सिक्योरिटी स्टाफ और एयरपोर्ट अथॉरिटीज़ के लोग अपने आप कर लेंगे। ऐनी ने आरती को सुझाया।
आरती ने तुरन्त ही अपने सिक्के को एक्टीवेट करके नीटा-रेज़ (नीटा-किरणों) की पिस्टल की व्यवस्था करके ऐनी से कहा-ठीक है ऐनी, अब मैं अपने मिशन पर चलती हूँ।
ओ के बैस्ट ऑफ लक, आरती।ऐनी ने आरती से कहा।
और कुछ ही देर में आतंकवादियों से अदृश्य आरती ने विमान में पीछे के भाग में खड़े हुए मुस्तैद आतंकवादी को नीटा-रेज़ की पिस्टल से गोली दाग दी और साथ में एक जोरदार घूँसा भी जड़ दिया। गोली और घूँसा लगते ही आतंकवादी तुरन्त ही बेहोश होकर ढ़ेर हो गया। इससे पहले कि आगे खड़ा हुआ आतंकवादी कुछ समझ पाता, उसको भी गोली और घूँसा लग चुका था और वह भी बेहोश होकर ढ़ेर हो चुका था।   
विमान के सभी यात्री आरती की गतिविधियों को देखकर आश्चर्यचकित भी थे और हैरान भी थे। आश्चर्यचकित तो इस बात से थे कि दस-बारह साल की एक छोटी-सी बालिका का सिर्फ एक ही धूँसा लगते ही इतना बड़ा आतंकवादी बेहोश कैसे हो गया। और कितनी तत्परता और कुशलता से एक छोटी-सी बालिका ने सभी आतंकवादियों को पलक झपकते ही ढ़ेर कर दिया था। सभी यात्रियों में आरती का फुर्तीलापन चर्चा का विषय बन गया था।
अब आरती ने कॉकपिट में जाकर तीसरे आतंकवादी को भी गोली और धूँसा मारकर बेहोश कर दिया। तीसरे आतंकवादी के ढ़ेर होते ही विमान के पायलेट और क्रू-मेम्बर्स ने अपने आप को सुरक्षित और नॉर्मल अनुभव किया।
अब आपका विमान और विमान के सभी यात्री पूर्णरूप से सुरक्षित है। विमान के तीनों हाईजैकर आतंकवादी अब बेहोश हो चुके हैं और वे आठ-दस घण्टे से पहले होश में आने वाले नहीं हैं। अच्छा होगा कि होश में आने से पहले ही आप इन्हें ग्राउन्ड सिक्योरिटी को सौंप दें। आरती ने महिला पायलेट को बताया।
ए लॉट ऑफ थैंक्स टु यू, डियर गाइज़। रियली, यू डिड ए वैरी डेन्जरस, डेयरिंग डीड। गॉड ब्लैस यू, स्वीट गर्ल। विमान की महिला पायलेट ने कृतज्ञता प्रकट करते हुए आरती से कहा।
नो थैंक्स मेडम, इट्स मॉय ड्यूटी, व्हिच आई डिड।आरती ने शालीनता के साथ कहा।
गाइज़, मे आई नो योर गुड नेम, प्लीज। महिला पायलेट ने आरती से पूछा। 
यस श्योर, आई एम आरती एण्ड आई विल सी यू लेटरऑन। बट एट प्रज़ेन्ट, आई एम इन हरी, प्लीज़। ऐसा कहते हुए आरती शीघ्रता के साथ केबिन से बाहर आ गई।
आरती ने विमान के कॉकपिट से बाहर निकलकर आगे की सीटों पर बैठे हुए दो-तीन नव युवक यात्रियों से निवेदन करते हुए कहा-भैया आप जरा विमान के पीछे के भाग में रस्सियों से बँधी हुईं अपने विमान की दोनों एयर होस्टेज़ की रस्सी खुलवाने में हमारी सहायता करें। 
तीन-चार नव युवक तुरन्त ही सहायता के लिये आगे आ गये। साथ ही प्रधानमंत्री का सिक्योरिटी का स्टाफ भी हरकत में आ चुका था। देखते ही देखते, किसी ने एयर होस्टेज की रस्सी खोली तो किसी ने आतंकवादियों की तलाशी लेकर उनके पास के सभी अत्यन्त आधुनिक हथियारों, एके 47 राइफल्स और हैन्ड-ग्रेनेड आदि को लेकर एयर होस्टेज की देख-रेख में सुरक्षित स्थान पर रखवा दिए।
 और फिर विमान के कॉकपिट में के बेहोश पड़े आतंकवादी को घसीटकर बाहर निकाल कर तीनों आतंकवादियों को रस्सियों से कसकर बाँध दिया गया। लोगों का सहयोग तो देखते ही बनता था। अब विमान पूर्णरूप से सुरक्षित था।
विमान की महिला पायलेट और क्रू मेम्बरर्स ने एयरपोर्ट अथॉरिटीज़ को यह सूचना दी कि तीनों आतंकवादी अभी बेहोश हैं और उन्हें रस्सियों से बाँधा हुआ है। अतः शीघ्र ही विमान के इमर्जेन्सी लैन्डिग की व्यवस्था कर हमें लैन्डिग की अनुमति दें ताकि हम इन हाईजैकर आतंकवादियों को ग्राउन्ड सिक्योरिटी फोर्स को सौंप सकें।
ड्रीमलाइनर विमान एयरपोर्ट पर सकुशल लैन्ड कर चुका था। रस्सियों से बँधे हुए तीनों बेहोश हाईजैकर आतंकवादियों को और उनके पास से मिले सभी हथियारों को ग्राउन्ड सिक्योरिटी फोर्स को सौंप दिया गया। सिक्योरिटी फोर्स को सौंपने के बाद विमान की विधिवत् चैकिंग की गई और यह निश्चित किया गया कि अब वह पूर्ण सुरक्षित है।
इसके बाद सभी यात्रियों को लेकर ड्रीमलाइनर विमान अपने निर्धारित डेस्टीनेशन की ओर टेकऑफ कर गया। प्रधानमंत्री, उच्च-स्तरीय प्रतिनिधि मण्डल और सभी यात्री अपनी निर्धारित यात्रा की ओर बढ़ गये थे। 
प्रघानमंत्री दस-बारह साल की उस अज्ञात सहासिक बालिका से मिलकर उसे धन्यवाद देना चाहते थे। उन्होंने एयर होस्टेज़ से कहकर उसे बुलाकर उससे मिलने की इच्छा व्यक्त की। विमान में अज्ञात बालिका को देखा गया, पर विमान में वह अज्ञात बालिका कहीं भी दिखाई नहीं दी। लोगों से पूछा भी गया, पर कोई भी कुछ भी न बता सका, उस अज्ञात बालिका के बारे में।
विमान की महिला पायलेट से पूछने पर उसने उस अज्ञात बालिका का नाम आरती बताया। पर पैसेन्जरर्स लिस्ट में आरती नाम का कोई भी पैसेन्जर था ही नहीं।  
तब आरती कौन थी, कहाँ से आई थी और अब वह विमान में क्यों नहीं है। तब क्या उस अज्ञात बालिका ने अपना नाम गलत बताया था या फिर विमान की सुरक्षा में कोई चूक हो गई।
सब कुछ एक रहस्य बनकर ही रह गया था, सभी लोगों के लिये। पर सीसीटीवी कैमरे के फुटेज़ में तो वह साफ-साफ नज़र आ रही थी। तब कहाँ गई आरती। और ड्रीमलाइनर विमान में से आरती का अचानक ही गायब हो जाना सभी लोगों के लिए एक पहेली बनकर रह गया था।
 ड्रीमलाइनर विमान के स्टाफ के लिए आरती का गायब हो जाना मुश्किल का सबब बन कर रह गया था। एयर-हॉस्टेज और क्रू-मेंम्बर्स की समझ में नहीं आ रहा था कि अब वे प्रघानमंत्री को जबाब दें भी तो क्या दें। कहाँ से लाकर दें वे उन्हें, उस छोटी-सी बालिका आरती को, जिसने उन सभी को आतंकवादियों के चंगुल से मुक्त कराया है। जबकि प्रघानमंत्री आरती से मिलना चाहते हैं, उसे धन्यवाद देना चाहते हैं। विमान का कोना-कोना छान मारा था सभी ने, पर आरती कुछ भी पता न चल सका था। 
इधर आरती अपने बाल-यान में वापस आ चुकी थी। आरती और उसके सभी मित्र आज बहुत खुश थे क्योंकि आज उन्होंने ऐनी ऐंजल की सूज-बूझ और सहयोग से प्रधानमंत्री और उच्च-स्तरीय प्रतिनिधि मण्डल को ही नहीं अपितु अनेकों परिवारों को भी दुःखी होने से बचा लिया था। साथ ही देश की प्रतिष्ठा और मान-सम्मान को बचाकर प्रधानमंत्री और उनके ड्रीमलाइनर विमान को खूँख्वार हाईजैकर आतंकवादियों से मुक्त करा दिया था।
सीताराम हलवाई की दुकान से पैक कराया हुआ गरमागरम समोसे, जलेबी और फाफड़े आदि का नाश्ता भले ही ठंडा हो गया था, पर बच्चों के गरमागरम जोश और उत्साह में वह सब कुछ भी बहुत ही अच्छा और स्वादिष्ट लग रहा था। वैसे भी जब भूख लगी हो और मन खुशियों से अटा पड़ा हो तब तो सब कुछ अच्छा ही अच्छा लगता है। भूख के आगे नाश्ते का कद बहुत बौना लग रहा था। सब सोच रहे थे कि काश, थोड़ा और अधिक नाश्ता पैक कराया होता तो कितना अच्छा होता।
बाल-यान विशाल अन्तरिक्ष के मन-भावन सुन्दर रमणीय भूरे-काले बादलों को चीरता हुआ आरती के नगर और घर की ओर प्रस्थान कर चुका था। श्वेत-वर्ण वादलों पर सूर्य की किरणें कहीं तो स्वर्णिम आभा बिखेर रहीं थी तो कहीं पर रक्तिम लाल-वर्ण की मनुहारी आभा के दुर्लभ दर्शन, सुलभ हो रहे थे।
आरती और उसके सभी मित्रों के आनन्द और उत्साह को नापने के सभी पैमाने आज छोटे पड़ गए थे। निःस्वार्थ परोपकार और अच्छा काम करने की खुशी सभी बालकों के अंग-अंग पर पसरी पड़ी थी। मन में उत्साह और उमंग का समुन्दर हिलोरें मार रहा था।
जल्दी से जल्दी अपने घर पर पहुँचकर सभी बालक अपने-अपने रोमांचकारी अनुभवों को अपने मम्मी-पापा और अपने बाल-मित्रों के साथ शेयर करने को लालायत थे। अविस्मर्णीय अनुभवों का खजाना जो था, उनके पास।
दूसरे दिन देश-विदेश के लगभग सभी स्थान के समाचारपत्र और इलैक्ट्रोनिक मीडिया प्रधानमंत्री और ड्रीमलाइनर विमान के अपहरण और उसके छूटने की घटना से भरे पड़े थे।
आरती का साहसिक कदम सभी जगह पर विशेष चर्चा का विषय बना हुआ था। आरती का नाम, फोटो और ड्रीमलाइनर विमान के अन्दर लगे हुए सीसीटीवी कैमरों के द्वारा लिए गए वीडियो फुटेज ही सभी टेलीविज़न चैनल्स पर चलाए जा रहे थे। क्योंकि वे ही तो उपलब्ध हो सके थे मीडिया को और सरकार को। इसके अलावा और कुछ भी तो नहीं मालूम था किसी को भी, आरती के बारे में।  
सभी लोग आरती के बारे में जानने के इच्छुक थे, आरती से मिलने के इच्छुक थे और स्वयं प्रधानमंत्री श्री को भी उस साहसी बालिका आरती से मिलने का इन्तजार था।
दूसरी ओर एयरपोर्ट अथोर्टीज़, एयर-हॉस्टेज, क्रू-मेंम्बर्स और सिक्योरिटी स्टाफ को भी मंत्रालय की ओर से मिलने वाले शो-कौज़ नोटिस का इन्तज़ार था। क्योंकि उन्हें भी तो अपने-अपने स्पष्टीकरण पीएमओ को देना था। पीएम की सुरक्षा-व्यवस्था में होने वाली चूक और सेंध लगने का कारण भी तो बताना था।
आरती की खोज अभी भी जारी थी और सभी को आरती के इन्टरव्यू का इन्तजार था।                                

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आनन्द विश्वास


Monday, 7 September 2015

*चलो, करें जंगल में मंगल*

चलो,  करें   जंगल  में  मंगल,
संग प्रकृति के  जी  लें दो पल।
बतियाएं कुछ  अपने मन की,
और  सुनें  उनके  जीवन  की।

मन  से  मन की  बात  बताएं,
और प्रकृति में घुल मिल जाएं।
देखो  झरने, क्या  कुछ  कहते,
कल-कल  करते  बहते  रहते।

हँसकर  फूल  बुलाते  हमको,
हँसते  रहो   सिखाते  हमको।
शान्त झील का दृश्य विहंगम्,
जलचर क्रीड़ा मधुरम् मधुरम्।

मोर नृत्य  करता, कुछ कहता,
कोयल-कण्ठ मधुर-रस बहता।
आसमान  के   अनगिन  तारे,
निश्छल  मन  से  हमें  पुकारे।

वो  देखो  बदली  घिर  आई,
दादुर  ने   अब   टेर   लगाई।
झम-झम  पानी बरस रहा है,
धरती का मन  हरस रहा है।

सर-सर  हवा  बही मतवाली,
चहके खग-मृग मनी दिवाली।
जंगल  में  मंगल  मन  जाए,
काश, कभी कुछ यूँ हो पाए।

यूँ  तो   जंगल  बचे  कहाँ हैं,
फिर  भी  ढूँढ़े   बचे  जहाँ हैं।
जंगल  में   मंगल  तब  होगा,
जंगल  कहीं  बचा जब होगा।

जंगल  बचा, बचेंगे हम  तब,
मर  जाएंगे,  बरना  हम  सब।
जागो, और बचा  लो  उसको,
जंगल बचा, बचा लो खुद को।
...आनन्द विश्वास

Sunday, 6 September 2015

*ऐंजल ऐनी और आरती*

*ऐंजल ऐनी और आरती*
यह कहानी मेरे बाल उपन्यास
बहादुर बेटी
से ली गई है।
...आनन्द विश्वास
शाम को आरती ने अपनी मम्मी को चमत्कारी सिक्के, रॉनली और अपने अदृश्य होने के विषय में सब कुछ बताया। यूँ तो आरती की मम्मी को इन सभी बातों में बहुत कम विश्वास था। फिर भी उन्हें अपनी बेटी आरती की योग्यता और समझदारी पर कोई शंका भी तो नहीं थी। 
उन्होंने फ्लाइंग-डिसिज़ के बारे में काफी कुछ सुना भी था और पढ़ा भी था। दूसरे ग्रहों से वहाँ के ऐलियन्स लोग पृथ्वी-लोक पर आते-जाते ही रहते हैं। उनका ज्ञान और विज्ञान हम लोगों के ज्ञान और विज्ञान से काफी अधिक विकसित हो और यह भी सम्भव हो सकता है कि उन्होंने यहाँ पर अदृश्य और गुप्त ठिकाने भी बना रखे हों। जिसकी जानकारी हमें अभी तक न हो सकी हो। यू-2 स्पॉइ-प्लेन, सुपर एरिया-51 और यूएफओ जैसी अनेक घटनाऐं देश-विदेश के मीड़िया में, समाचार-पत्रों में और जन-मानस की जवान पर अक्सर चर्चा का विषय बनी ही रहती है। 
साथ ही दूसरे ग्रहों पर जीवन के अस्तित्व को नकारा भी तो नहीं जा सकता। मालूम नहीं हो और यह कह दिया जाये कि ऐसा कुछ भी नहीं होता। ऐसा कह देना, उचित भी नहीं होता और ना ही बुद्धिमत्ता-पूर्ण।
आरती की मम्मी ने अपनी बेटी को उसके दिव्य-लोक के नये मित्र रॉनली से मिलने की अनुमति दे दी। साथ ही रॉनली से अपने मिलने की इच्छा भी व्यक्त कर दी और कहा कि यदि रॉनली को हम सब लोगों से मिलने में कोई आपत्ति न हो, तो एक मित्र होने के नाते, उसे अपने घर पर, चाय-नाश्ते के लिये बुलाया भी जा सकता है। इससे उसकी मित्रता की और वास्तविकता की परीक्षा भी हो जायेगी और आत्मीयता भी बढ़ जायेगी। आरती ने अपनी मम्मी के प्रस्ताव को उचित समझा। 
निश्चित समय से पहले ही आरती उस स्थान पर पहुँच गई और रॉनली का इन्तजार करने लगी। आरती ने अपने किसी भी मित्र या साथी को अपने साथ रखना उचित नहीं समझा।
कारण भी स्पष्ट था, यदि रॉनली अपने वचन के अनुसार नहीं आया या फिर कोई गड़बड़ हुई तो उस पर होने वाले कटाक्षों को और हास-परिहास को वह कैसे सहन कर सकेगी। वह अपने अन्य साथियों के बीच तमाशा भी तो नहीं बनना चाहती थी और ना ही किसी प्रकार की अनावश्यक चर्चा का विषय ही।
पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और रॉनली निश्चित समय पर ही उपस्थित हो गया। पर अभी भी वह आरती के लिये अदृश्य ही था। वह आरती को देख भी सकता था और सुन भी सकता था।
उसने आरती से कहा-आरती, तुम अपने पास में रखे हुये चमत्कारी सिक्के को अपने बायें हाथ की हथेली पर रखकर उसे अपने सीधे हाथ के अँगूठे से स्पर्श करो।   
रॉनली के कहने के अनुसार आरती ने अपने पास में रखे हुये सिक्के को बायें हाथ की हथेली पर रखा और फिर अपने सीधे हाथ के अँगूठे से जैसे ही स्पर्श किया, तुरन्त ही सिक्का ऐक्टीवेट हो गया और उसमें से रंग-बिरंगा चमकीला प्रकाश निकलने लगा। 
और कुछ ही क्षणों के बाद उसमें से निकलने वाला चमकीला प्रकाश बन्द हो गया। अब उसके ऊपर हरे, गुलाबी और लाल रंग के छोटे-छोटे तीन चमकीले बटन दिखाई देने लगे। इसके बाद रॉनली ने आरती से गुलाबी रंग के बटन को दबाने के लिये कहा। 
गुलाबी रंग के बटन को दबाते ही आरती ने अपने सामने रॉनली खड़ा हुआ पाया। पर आज वह अकेला नहीं था उसके साथ उसकी दो सगी बहनें भी थीं।
रॉनली के साथ दैवीय गुणों से सम्पन्न अन्य दो सौम्य, सुन्दर  और सुशील बालिकाओं को देखकर आरती को बहुत ही अच्छा लगा और उसे मन में प्रसन्नता भी हुई।
उसने रॉनली से पूछ ही लिया-रॉनली, तुम्हारे साथ में आई हुई ये लड़कियाँ कौन हैं। ये तो बहुत ही सुन्दर और प्यारी हैं।” 
आरती, ये दोनों मेरी सगी बहनें हैं यॉल्सी और चॉल्सी। कल मैंने जब तुम्हारे बारे में इन्हें बताया तो इनकी भी इच्छा तुमसे मिलने की हुई और ये तुमसे मिलने की जिद करने लगीं। इसीलिये मैं इन्हें भी अपने साथ ले आया हूँ। रॉनली ने बताया।
ये तो बहुत ही अच्छा किया, रॉनली तुमने। मुझे तो तुम्हारी दोनों बहन यॉल्सी और चॉल्सी से मिलकर बहुत ही अच्छा लग रहा है और मेरी मम्मी तो खुश-खुश ही हो जायेगी जब वे तुम सब लोगों से मिलेंगी। और फिर यॉल्सी और चॉल्सी को अपने गले से लगाकर आरती ने आत्मीयता और प्रसन्नता भी व्यक्त की।
बड़ा ही अच्छा लगा यॉल्सी और चॉल्सी को आत्मीयता भरे स्वागत को पाकर और उससे भी अधिक प्रसन्नता तो इस बात की हुई कि अब वे आरती की मम्मी से भी मिल सकेंगीं और उनसे ढ़ेर सारी बातें भी कर सकेंगी।
और जब आरती ने रॉनली को यह बताया कि मेरी मम्मी भी तुमसे मिलना चाहती हैं। उन्हें भी तुम सब से मिलकर बहुत खुशी होगी। तब तो रॉनली की खुशी का ठिकाना ही न रहा और उससे भी ज्यादा खुशी थी यॉल्सी और चॉल्सी को।
आरती ने रॉनली, यॉल्सी और चॉल्सी सभी को अपने घर पर ही चलने का आग्रह किया और कहा-चलो रॉनली, अब तो हम सब लोग अपने घर पर ही चलते हैं। वहीं पर बैठकर ढ़ेर सारी बातें भी करेंगे और साथ में खूब सारा नाश्ता भी करेंगे। बड़ा मज़ा आयेगा।
रॉनली ने पल भर के लिए अपनी आँखें बन्द कीं और फिर आँखें खोलकर आरती से कहा-आरती, अभी तो तुम्हारी मम्मी घर पर नहीं हैं। अभी तो वे तुम्हारी सकल ऑन्टी के घर पर गई हुईं हैं और तुम्हारे पापा भी अभी घर पर नहीं हैं। अभी तो घर पर कोई भी नहीं है, घर पर तो ताला लटका हुआ है। 
रॉनली की बातें सुनकर आरती को आश्चर्य हुआ और आश्चर्य से भी अधिक शंका। आरती को लगा कि रॉनली जानबूझ कर ही घर पर न चलने का बहाना बना रहा है और वह उसके घर पर जाना ही नहीं चाहता है। कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं है। शंका ने घर कर लिया था आरती के मन में।
अतः उसने रॉनली से पूछ ही लिया-रॉनली, तुम्हें कैसे पता चला कि मेरे मम्मी और पापा घर पर नहीं हैं।
आरती, क्या तुम्हें मेरे ऊपर विश्वास नहीं है। और क्या तुम ये सब कुछ अपनी आँखों से ही देखना चाहते हो, तभी विश्वास होगा तुम्हें, मुझ पर और मेरे शब्दों पर। रॉनली ने प्रश्न किया।
विश्वास तो है रॉनली। इसमें कोई शंका भी नहीं है और एक मित्र होने के नाते विश्वास तो होना ही चाहिये। पर, फिर भी मैं तुम्हारे इस कौतूहल को और चमत्कार को अपनी आँखों से देखना चाहती हूँ। आरती ने रॉनली की अविश्वास की बात को दरकिनार करते हुये अपना स्पष्टीकरण दिया। 
रॉनली ने अपने दोनों हाथों को आपस में रगड़ा और फिर सीधे हाथ की हथेली पर फूँक मारकर, हथेली को आरती की ओर बढ़ाते हुये कहा-देखो आरती, इस हाथ की हथेली पर देखो। इस पर तुम्हें तुम्हारे घर का मेन-गेट, घर का नम्बर और घर के गेट पर लगा हुआ ताला दिखाई दे जायेगा।
आरती ने रॉनली के कथन को सही पाया। वही गेट था, वही घर का नम्बर था और वही ताला था। उसके घर का दरवाजा बन्द था और दरवाजे पर ताला लगा हुआ था। 
फिर रॉनली ने आरती से कहा-देखो आरती, ये हैं तुम्हारी मम्मी, सकल ऑन्टी के घर पर, उनसे बातें कर रहीं हैं। अब क्या तुम उनकी आपस में होने वाली बातों को भी सुनना चाहोगे।
अब तो आरती की आतुरता और जिज्ञासा और भी अधिक प्रबल हो गई। साथ ही रॉनली के शब्दों के प्रति विश्वास भी।
उसने रॉनली से कहा-हाँ रॉनली, अब तो मैं अपनी मम्मी और सकल ऑन्टी के बीच होने वाली बातों को भी अपने कानों से सुनना चाहती हूँ। पर क्या तुम ऐसा भी कर सकते हो कि उनके बीच होने वाली बात-चीत भी मुझे स्पष्ट सुनाई दे सके।
  “हाँ हाँ, क्यों नहीं, आरती। ऐसा भी हो सकता है। हाँलाकि किन्हीं दो व्यक्तियों के बीच होने वाली बातों को सुनना नैतिकता की दृष्टि से उचित नहीं होता है और हमें ऐसा नहीं करना चाहिए। फिर भी, चूँकि वे हम लोगों के विषय में ही बातें कर रहे हैं अतः यह वार्तालाप सुना भी जा सकता है और देखा भी जा सकता है। ऐसा कहकर रॉनली ने सिस्टम की वॉइस को ऑन कर दिया। 
अब तो आरती को उसकी मम्मी और सकल ऑन्टी के बीच में होने वाली बातें भी स्पष्ट सुनाई देने लगीं। सभी वार्तालाप स्पष्ट सुनाई भी दे रहे थे और सब कुछ स्पष्ट दिखाई भी दे रहा था। बिलकुल स्पष्ट, टेलीविज़न के स्क्रीन की तरह।
कुछ ही पलों के बाद आरती की मम्मी ने सकल ऑन्टी के घर से विदा ली और अपने घर की ओर प्रस्थान किया।  
रॉनली ने आरती से कहा-आरती, अब कुछ ही समय के बाद तुम्हारी मम्मी अपने घर पर पहुँच जायेंगी। अतः अब हम सभी लोग तुम्हारे घर पर चल सकते हैं।
हाँ ठीक है रॉनली, अपन पार्क वाले रास्ते से घर चलते हैं। यह रास्ता हमें बहुत ही जल्दी घर पर पहुँचा देगा। आरती ने अपने घर को जाने वाले रास्ते का मार्ग-दर्शन करते हुये रॉनली को सुझाव दिया।
नहीं आरती, इस सबकी कोई आवश्यकता नहीं है। हम सब लोग वायु-मार्ग से पल भर में ही तुम्हारे घर पर पहुँच जायेंगे। बस कुछ देर के लिये एक-दूसरे का हाथ पकड़ लो। रॉनली ने आरती और अपनी दोनों बहनों से कहा। 
 रॉनली ने अपना हाथ हवा में हिलाया और कुछ कहा। कुछ ही क्षणों के बाद आरती ने अपने आप को, रॉनली, यॉल्सी और चॉल्सी के साथ, अपने घर के दरवाजे पर पाया।
रॉनली ने आरती के घर की डोर-बैल बजाई। दरवाजा खुलते ही उसने अपने सामने पाया आरती की मम्मी को। ममता की साक्षात् दिव्य-स्वरूप माँ को, ममता-मयी माँ को।
दिव्य-लोक के बालकों को अपने बीच में पाकर आरती की मम्मी को बहुत ही अच्छा लगा और साथ ही अपनी बेटी आरती की सूज-बूझ और समझदारी पर गर्व भी हुआ।
रॉनली ने आरती की मम्मी के चरण-स्पर्श किए और यॉल्सी-चॉल्सी ने झुककर अभिवादन किया। आरती ने यॉल्सी और चॉल्सी के विषय में अपनी मम्मी को बताया।
बड़ा ही अच्छा लगा आरती की मम्मी को। अच्छे संस्कार ही तो होते हैं जो मानव हृदय में अपने आप अपना स्थान बना लेते हैं और आत्मीयता का सिंचन भी कर देते हैं।
पानी-पानी हो गई थी माँ की ममता। अपने हृदय से लगा लिया था आरती की मम्मी ने, किसी दूसरे लोक के अनजान और अपरिचित दिव्य-बालकों को। सरहद की सीमा ही नहीं, लोक और परलोक की सीमाओं को भी लाँघ गई थी माँ की ममता। कितनी विशाल होती है माँ की ममता। विशाल ब्रह्माण्ड को भी अपने आँचल में समेंट लेने की क्षमता होती है, *माँ* में और *माँ की ममता* में।
 “आओ बेटा, तुम तो बड़ी दूर से आये हो, बहुत थक गये होगे, बैठो और थोड़ा आराम भी कर लो। मैं अभी तुम्हारे लिये पानी और कुछ नाश्ता लेकर आती हूँ। बड़ी भूख लग रही होगी। ऐसा कहकर आरती की मम्मी किचिन की ओर चली गईं और भोले बाल-गोपाल माँ का आदेश पाकर सोफा की ओर हो लिये।
पानी पीने के बाद नाश्ते में अभी कुछ देरी थी और चुपचाप बैठना तो बच्चों को कहाँ भाता है। चंचलता और क्रियाशीलता ही तो बच्चों की पहचान होती है। अतः आरती ने अपने दिव्य-लोक के सभी मित्रों को अपने स्टडी-रूम में ले जाना उचित समझा। जहाँ उसने अपनी डॉल्स, टैडीबियर, देश-विदेश के इकठ्ठे किए हुए दुर्लभ कॉइन्स्, स्टैम्पस् आदि के कलैक्शन को दिखाया। इतना ही नहीं अपनी बुक्स् के कलैक्शन, प्राइजेज़, शील्डस् और अपने स्कूल के मित्रों के ढ़ेर सारे फोटोग्राफस् भी दिखाये। 
रॉनली और उसकी दोनों बहनों को आरती की सरल-सादगी, निर्मल-मन, भोलापन और स्पष्ट बयानी बड़ी ही अच्छी लगी। न कोई आडम्बर, न कोई दिखावा, बिलकुल सीधा-सादा खुला मन और आत्मीयता भरा सरल व्यवहार। आरती अपने नये मित्रों से ऐसे घुल-मिल गई थी जैसे कि वे लोग, आज से नहीं,  युगों-युगों से एक-दूसरे से परिचित हों।
यॉल्सी ने अपने भाई रॉनली से पता नहीं किस भाषा में कुछ कहा। शायद उनके दिव्य-लोक की कोई भाषा रही होगी या फिर कुछ और, पता नहीं। पर आरती कुछ भी न समझ सकी।
रॉनली पहले तो मुस्कुराया फिर उसने हँसते हुये यॉल्सी से कहा-अच्छा रहेगा और फिर जैसा तुम उचित समझो।
 यॉल्सी ने अपना सिर हिलाकर सहमति जताई और चॉल्सी ने निर्णय को उचित ठहराया। इसके बाद रॉनली ने अपने सीधे हाथ को हवा में ऊपर-नीचे हिलाया और कुछ बोला भी। तुरन्त ही रबड़ की एक बहुत सुन्दर गुड़िया, लगभग तीन-चार फुट की रही होगी, रॉनली के हाथों में आ गई।
रॉनली ने उस रबड़ की गुड़िया को आरती के हाथों में देते हुये कहा-आरती, यह चमत्कारी गुड़िया तुम यॉल्सी और चॉल्सी की ओर से एक छोटा-सा उपहार समझकर अपने पास रखो। इसी चमत्कारी गुड़िया के लिये ही यॉल्सी और चॉल्सी ने अभी-अभी मुझसे आग्रह किया था। 
सुन्दर और आकर्षक रबड़ की गुड़िया आरती के मन को भा गई। उसने यॉल्सी और चॉल्सी को धन्यवाद दिया और फिर गुड़िया को अपने सामने ही रखी कुर्सी पर बैठाते हुये रॉनली से कहा-रॉनली, बड़ी ही प्यारी है यॉल्सी और चॉल्सी की ये अद्भुत भेंट। यह तो सुन्दर भी है और आकर्षक भी। मुझे तो बेहद पसन्द है तुम्हारी ये रबड़ की गुड़िया।
आरती, ये कोई सामान्य ऐसी-वैसी रबड़ की गुड़िया नहीं है, ये तो चमत्कारी गुड़िया है। इसका नाम ऐनी ऐंजल है। ये तुम्हारी हर समस्या का समाधान करने में समर्थ है। इसे तुम जब चाहो तब ऐक्टीवेट कर सकते हो और जब चाहो तब डीऐक्टीवेट कर सकते हो। और अब से ये तुम्हारे हर कमाण्ड का पालन करेगी। रॉनली ने आरती को ऐंजल की विशेषता बताते हुये कहा। 
पर रॉनली, मैं इसे कैसे ऐक्टीवेट कर सकती हूँ। इसके बारे में तो मुझे कुछ भी नहीं मालूम है। आरती ने अपनी विवशता को स्पष्ट करते हुए कहा। 
आरती, जब तुम अपने दायें हाथ के अँगूठे को इसके दायें हाथ के अँगूठे से स्पर्श करोगे तो यह ऐंजल अपने आप ऐक्टीवेट हो जायेगी। तब तुम इससे जो भी प्रश्न पूछोगे या इससे कोई अन्य जानकारी प्राप्त करना चाहोगे, तो उसका सही उत्तर भी देगी और तुम्हारी हर समस्या का समाधान भी करेगी। रॉनली ने आरती को समझाया।
अरे वाह, तब तो अपनी ऐनी ऐंजल हम सबके लिये बहुत ही उपयोगी सिद्ध हो सकती है और इसकी सहायता से तो अनेक क्षेत्रों में ढ़ेर सारे उपयोगी और परजन हिताय कार्य भी किये जा सकते हैं। इतना ही नहीं, इसकी सहायता से तो हम अपने समाज में व्याप्त अनेक सामाजिक बुराइयों को भी दूर कर सकते हैं। आरती ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा।   
इतना ही नहीं आरती, ऐनी ऐंजल से तुम जिस भी भाषा में बात करोगे, ये तुमसे उसी भाषा में बात कर सकती है। ये जंगली जानवर, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और अन्य ग्रह के सभी प्राणियों की भाषा को समझ सकती है और बोल भी सकती है। इसका आकार तुम छोटा और बड़ा कर सकते हो और दूसरों से अदृश्य भी कर सकते हो। रॉनली ने आरती को समझाते हुये कहा।
अच्छा रॉनली, तब तो ये ऐंजल बहुत ही चमत्कारी है। क्या मैं इसे अभी ऐक्टीवेट कर सकती हूँ। आरती ने पूछा।  
हाँ, क्यों नहीं। तुम जब चाहो तब इसे ऐक्टीवेट कर सकते हो। और जब चाहो तब डीऐक्टीवेट भी कर सकते हो। पर तुम्हें इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा कि इसका उपयोग केवल अच्छे और परोपकारी कार्यों के लिये ही होना चाहिये। इसका दुरुपयोग करने पर यह शक्ति तुमसे हमेशा-हमेशा के लिए दूर चली जायेगी और फिर कभी भी वापस नहीं आ सकेगी। रॉनली ने आरती को ऐंजल की विशेषताओं को समझाते हुये कहा।
ठीक है रॉनली, मैं ऐनी ऐंजल की दिव्य-शक्ति और विद्या का उपयोग केवल अच्छे कार्यों के लिये और दूसरों की भलाई के लिये ही करूँगी। आरती ने रॉनली को आश्वासन देते हुए कहा।
अच्छा आरती, अब तुम इसे ऐक्टीवेट करके, इससे कुछ भी पूछ सकते हो। रॉनली ने आरती से कहा।
और जैसे ही आरती ने अपने सीधे हाथ के अँगूठे से ऐंजल के सीधे हाथ के अँगूठे को स्पर्श किया, ऐनी ऐंजल ऐक्टीवेट हो गई। अब वह किसी भी समस्या का समाधान करने में सक्षम थी।
आरती, अब अपनी ऐंजल ऐक्टीवेट हो चुकी है। अब तुम इससे कोई भी प्रश्न पूछ सकते हो। अपनी कोई भी समस्या इसके सामने रख सकते हो।रॉनली ने आरती से कहा।
क्या प्रश्न पूछूँ, रॉनली। कुछ तो बताओ। मेरी समझ में तो कुछ भी नहीं आ रहा है। आरती ने रॉनली से कहा।
अच्छा ठीक है, मैं ही इससे कोई कठिन-सा प्रश्न पूछता हूँ। रॉनली ने कहा।
हाँ रॉनली, तुम्हीं ऐनी ऐंजल से कोई प्रश्न पूछकर बताओ कि इससे किस प्रकार से प्रश्न पूछे जा सकते हैं। आरती ने कहा।
स्वामी विवेकानन्द जी का जन्म कब और कहाँ हुआ था। रॉनली ने ऐनी ऐंजल से प्रश्न किया।
स्वामी विवेकानन्द जी का जन्म 12 जनवरी 1863 के दिन कोलकता में हुआ था।ऐनी ऐंजल का उत्तर था।
स्वामी विवेकानन्द जी के माता और पिता के नाम बताओ।रॉनली ने ऐंजल से दूसरा प्रश्न किया।
स्वामी विवेकानन्द जी की माता नाम भुवनेश्वरी देवी और उनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्ता था।ऐंजल का उत्तर था।
हिन्दी साहित्य में आकाश-दीप कहानी के रचयिता का क्या नाम है। और अब यह प्रश्न पूछा था आरती ने। 
हिन्दी साहित्य में आकाश-दीप कहानी के रचयिता का नाम जयशंकर प्रसाद है। ऐंजल का उत्तर था। 
सुनीता विलियम्स का जन्म कब और कहाँ हुआ था। आरती ने एक और प्रश्न किया।
अन्तरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स का जन्म 19 सितम्बर सन् 1965 के दिन में ओहियो (अमेरिका) में हुआ था। इनके पिता का नाम डॉ दीपक पांड्या हैं, जो भारत में अहमदाबाद के पास झूलासण गाँव के रहने वाले हैं। ऐना ऐंजल ने आरती के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा।    
अकबर दरबार के नव-रत्नों के नाम क्या-क्या थे, बताओ। यह सोचकर कि इतना कठिन प्रश्न शायद ऐनी ऐंजल न बता सके, आरती ने पूछा।
सम्राट अकबर के दरबार के नव-रत्नों के नाम, अबुल फ़ज़ल, अब्दुल रहींम खान-ए-खाना, बीरबल, फैज़ी, शेख मुबारक, राजा मान सिंह, टोडर मल, फकीर अज़िया-ओ-दीन और तानसेन थे। ऐंजल ऐनी ने आरती के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा।  
ऐनी ऐंजल का उत्तर सुनकर तो आरती उछल ही पड़ी। अपने बेस्ट-फ्रेन्ड रॉनली की बहनों से मिली, ऐसी आश्चर्यजनक भेंट ऐनी ऐंजल को पाकर आरती की खुशी का ठिकाना ही न रहा।
उसके मुँह से अचानक निकल ही पड़ा-रॉनली, अब तो ऐनी ऐंजल मेरी बहुत सारी समस्याओं का समाधान कर सकेगी। और इसके सहयोग से तो मैं गरीब बच्चों की पढ़ाई में उनकी सहायता भी कर सकूँगी।
इतना ही नहीं आरती, यह ऐंजल तो तुम्हारी हर प्रकार की आवश्यकता की पूर्ति भी कर सकती है। इसके साथ तुम किसी भी लोक या ग्रह का भ्रमण भी कर सकते हो। इसके साथ तुम्हारे ऊपर आग, पानी, गर्मी-सर्दी, धूप और वायु-मण्डल का कोई भी प्रभाव नहीं पड़ेगा। हर दीवार तुम्हारे लिये पार-दर्शी हो जायेगी। किसी भी स्थान पर होने वाली घटनाओं और वार्तालापों को आसानी से तुम देख भी सकते हो और सुन भी सकते हो। रॉनली ने ऐंजल की महत्ता को समझाते हुये आरती से कहा।
तो क्या मैं आकाश-मार्ग में इसके साथ भ्रमण कर सकती हूँ, रॉनली। आरती ने पूछा।
हाँ, क्यों नहीं। यह ऐंजल तुम्हारा मार्ग-दर्शन कर सकेगी।रॉनली ने आरती की शंका का निवारण करते हुए कहा।
और तभी बाहर से डोर-बैल बजी, शायद गेट पर कोई था। मम्मी किचिन में थीं अतः आरती ने ही दरवाजा खोला। दरवाजा खोलते ही उसने अपनी फ्रेन्ड मानसी को अपने सामने पाया।   
मानसी, वैसे तो मूल रूप से गुजरात के अहमदाबाद की रहने वाली है। अधिकतर तो वह गुजराती ही बोलती है पर कुछ शब्द हिन्दी और अंग्रेजी के मिक्स करके अपना काम चला लेती है। पर हिन्दी और अंग्रेजी को समझने में उसे कोई परेशानी नहीं होती है।  
हॉय मानसी, तेरी उमर तो बहुत लम्बी है। अभी-अभी तो मैं तुझे ही याद कर रही थी। देख तो सही मेरे घर पर कौन आया है। दिव्य-लोक से मेरा मित्र रॉनली और उसकी सगी बहनें यॉल्सी और चॉल्सी।और ऐसा कहते-कहते वे दोनों स्टडी-रूम तक पहुँच चुके थे जहाँ पर कि रॉनली, यॉल्सी और चॉल्सी बैठे हुये थे।
दिव्य-लोक थी आव्या छे तमारा मित्रो, आरती। आ लोक नी तो मने खबरज़ नथी। क्याँ आवेलो छे आ दिव्य-लोक। मानसी ने आश्चर्यचकित होकर आरती से पूछा।
ये दिव्य-लोक अपनी पृथ्वी से दूर, बहुत दूर कोई दूसरा ग्रह है। शायद उस ग्रह पर भी अपन जैसे ही आदमी रहते होंगे मानसी। ये लोग उसी ग्रह से अपने यहाँ पर आये हुये हैं। और इससे ज्यादा जानकारी तो मुझे भी नहीं है मानसी। अब मैं जब इनसे और बात-चीत करूँगी तब ही तो पता चल सकेगा इनके बारे में और इनके दिव्य-लोक के बारे में।आरती ने मानसी को समझाते हुये कहा।
और तब तक तो दोनों स्टडी-रूम में पहुँच चुके थे। कमरे में सामने ही इतनी बड़ी तीन-चार फुट की रबड़ की गुड़िया को कुर्सी पर बैठा हुआ देखकर मानसी को बड़ा आजीब-सा लगा। पल भर के लिए तो उसका दिमाग ही चकरा गया और उसके मुँह से निकल ही पड़ा-आरती, तारी आ रबड़ नी ढींगली तो बहु सारी छे। ऐ तो सरस मज़ा नी छे, आटली मोटी रबड़ नी ढींगली। आ ढींगली तू क्याँ थी लाई छे, आरती। हूँ पण लाविश।
इधर ऐनी ऐंजल ऐक्टीवेट-मोड में थी अतः उसने तुरन्त ही मानसी को उत्तर दिया-मानसी बैन, हूँ रबड़ नी ढींगली नथी, हूँ तो ऐंजल छूँ। म्हारो नाम ऐनी ऐंजल छे अने हूँ आरती बैन नी फास्ट-फ्रेन्ड छूँ।
रबड़ की गुड़िया को मनुष्य की तरह से बात-चीत करते हुये देखकर तो मानसी चौंक ही गई। उसके आश्चर्य का तो ठिकाना ही न रहा और वह आरती से पूछ बैठी-आरती, आ रबड़ नी ढींगली तो आपणा जेवी रीते बातो करे छे अने ऐ तो गुजराती पण बोली सके छे। सुपर छे तारी आ रबड़ नी ढींगली।
 हाँ मानसी, ऐनी ऐंजल को मेरे बैस्ट-फ्रेन्ड रॉनली की बहन यॉल्सी और चॉल्सी ने मुझे गिफ्ट के रूप में दिया है। आरती ने मानसी को समझाते हुये कहा और फिर सभी का एक-दूसरे से परिचय करवाया। 
रॉनली और उसकी बहन यॉल्सी और चॉल्सी को मानसी से मिलकर अपार आनन्द की अनुभूति हुई। मानसी का बात-चीत करने का सुपर अंदाज, उसका हँसमुख चेहरा, विशेषकर उसका गुजराती बोलने का तरीका, स्पष्ट बयानी और भोलापन सबको अच्छा लगा। मानसी को भी दिव्य-लोक के दिव्य और अलौकिक बालकों से मिलकर बहुत अच्छा लगा।
तभी किचिन से आरती की मम्मी की आवाज सुनाई दी-चलो बच्चो, गरमागरम नाश्ता तैयार है। 
सभी बच्चे मम्मी की आवाज सुनते ही अपनी बात-चीत के सिलसिले को बन्द कर डाइनिंग-टेबल पर पहुँच गये। माँ के हाथ का बना हुआ गरमागरम नाश्ता डाइनिंग-टेबल पर पहले से ही उनके आगमन की प्रतीक्षा कर रहा था। गरमागरम नाश्ता तो वैसे भी बालकों को प्रिय होता है और उसमें अगर माँ का प्यार भी मिला हो फिर तो सोने में सुहागा ही समझो।
सभी बच्चों ने जमकर खूब नाश्ता किया। बात-चीत और नाश्ते में कब समय बीत गया कुछ पता ही न चल सका। न तो बच्चों को ही और ना ही ममता-मयी माँ को ही।
घड़ी की ओर देखते हुए रॉनली ने आरती से कहा-आरती, काफी समय हो गया है अब तो हमें चलना ही होगा, घर पर भी चिन्ता हो रही होगी।
ठीक है रॉनली, जैसा तुम उचित समझो और वैसे भी काफी समय हो चुका है अब तो।आरती ने कहा।
हाँ आरती, अभी तो हमें जाना होगा। पर शीघ्र ही हम लोग दुबारा मिलेंगे। तब हम सब लोग मिलकर विस्तार से सभी बातों की चर्चा कर सकेंगे और एक दूसरे से और अधिक परिचित हो सकेंगे। रॉनली ने आरती को शीघ्र मिलने का आश्वसन दिया। 
और इस बीच रॉनली, यदि मैं तुमसे सम्पर्क करना चाहूँ तो कैसे सम्पर्क हो सकेगा। आरती ने जानना चाहा।  
हाँ आरती, जब तुम अपने पास में रखे हुये चमत्कारी सिक्के को ऐक्टीवेट करके उसका लाल बटन दबाओगे तो तुम्हारी मुझसे तुरन्त ही बात हो सकेगी और यदि तुम सिक्के का गुलाबी बटन दबाओगे तो मैं कहीं पर भी होऊँगा, कुछ ही समय के अन्दर, मैं तुम्हारे पास पहुँच जाऊँगा। रॉनली ने रहस्यमयी सिक्के का राज़ आरती को बताया। 
ठीक है रॉनली, मैं आवश्यकता पड़ने पर ही इसका उपयोग करूँगी, अन्यथा नहीं। आरती ने आश्वसन दिया।
रॉनली ने आरती से कहा-अब अगली बार जब भी मेरा यहाँ पर आना होगा तब मैं तुम्हें अपनी इच्छा-शक्ति यानि कि विल-पावर की दिव्य-शक्ति की डिवाइस दे दूँगा। तब तुम्हें चमत्कारी सिक्के की भी कोई आवश्यकता नहीं रहेगी और तब तुम अपनी आवश्यकताओं का और अपनी इच्छाओं का संचालन स्वयं ही कर सकोगे। अपनी इच्छा के अनुसार कहीं भी आ जा सकोगे।
जैसा तुम उचित समझो, रॉनली। आरती ने अपनी स्वीकृति देते हुए रॉनली से कहा।
और फिर रॉनली ने आरती की मम्मी के चरण-स्पर्श किये और उसकी दोनों बहनों ने झुककर अभिवादन किया और जाने की अनुमति ली।
आरती की मम्मी ने ढ़ेर सारा आशीर्वाद दिव्य-लोक के प्यारे बालकों को देते हुये रॉनली से कहा-बेटा रॉनली, जब भी तुम्हारा इस लोक में आना हो तो घर पर जरूर होकर जाना। इस घर को अपना ही घर समझना। तुम्हारी एक माँ यहाँ भी रहती है।
हाँ, मम्मी। अब जब-जब भी हमारा पृथ्वी-लोक पर आना होगा तो हम आपके दर्शन करने अवश्य ही आयेंगे। हमें भी आप सबकी बहुत याद आएगी, मम्मी जी। आपका स्नेह, प्यार और दुलार हम सबको आपके पास तक जरूर ही खींचकर ले आएगा। और ऐसा कहते-कहते रॉनली का मन भारी हो गया।
मधुर स्नेह-मयी यादों को अपने मन में समेंटे हुए रॉनली, यॉल्सी और चॉल्सी ने आरती और मानसी से विदा ली। और कुछ ही पलों के बाद रॉनली और उसकी बहनों ने अपने दिव्य-लोक की ओर प्रस्थान किया।

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Thursday, 3 September 2015

ये देखो मेट्रो का खेल

ये देखो मेट्रो का खेल
...आनन्द विश्वास
नीचे   मोटर   ऊपर   रेल,
ये  देखो   मेट्रो  का   खेल।
कभी चले धरती के अन्दर,
और कभी धरती  से ऊपर।

कभी कहीं धरती पर चलकर,
पहुँचाती  सबको मँजिल पर।
ऑटो-मेटिक  सब सिस्टम हैं,
और  सुरक्षित  इसमें  हम हैं।

सर्दी   गर्मी   और  धूप  से,
झम-झम वर्षा लू प्रकोप से।
हमको  सदा  बचाती रहती,
मँजिल तक पहुँचाया करती।

दरवाजे  खुद खुल  जाते हैं,
यात्री  बाहर  आ  जाते  हैं।
बन्द द्वार  हों तब चलती है,
एसी की सुविधा मिलती है।

नीचे  से  ऊपर  तक  जाओ,
ऊपर  से  नीचे  आ  जाओ।
और  लिफ्ट  फर्राटे  भरती,
वृद्धजनों  की  सेवा करती।

जीवन-डोरी   बड़े   नगर  की,
हर मुश्किल हल करे डगर की।
सस्ता  भाड़ा  सुविधा ज्यादा,
ये   भैया   मेट्रो   का   वादा।

...आनन्द विश्वास