Friday, 29 December 2017

*मेरी कार, मेरी कार*

मेरी    कार,    मेरी    कार,
सरपट   दौड़े,   मेरी   कार।

पापा  को ऑफिस ले जाती,
मम्मी  को  बाजार  घुमाती।
कभी  द्वारकाकभी आगरा,
सैर -  सपाटे  खूब  कराती।

भैया  के  मन  भाती  कार,
मेरी    कार,    मेरी   कार।

जब  शादी  में जाना  होता,
या  मंदिर  में जाना   होता।
इडली,  ढोसापीजाबर्गर,
जब होटल में खाना होता।

सबको  लेकर  जाती  कार,
मेरी    कार,     मेरी    कार।

बस के धक्के और धूल  से,
गर्मी   हो  या   पानी  बरसे।
मुझे    बचाती,  मेरी   कार,
खाँसी  भागी, मनवा  हरसे।

और न आता कभी  बुखार,
मेरी    कार,    मेरी    कार।

छोटा   भैया   कहता - दीदी,
सभी  खिलोने लेकर चलते।
घर-घर खेलेंचलो  कार में,
पापा-मम्मी खुश-खुश रहते।

जब  से  आई, घर  में  कार,
मेरी     कार,    मेरी    कार।
*** 
-आनन्द विश्वास

Thursday, 31 August 2017

"छूमन्तर मैं कहूँ..."

छूमन्तर मैं कहूँ और फिर,
जो चाहूँ बन जाऊँ।
काश, कभी पाशा अंकल सा,
जादू मैं कर पाऊँ।

हाथी को मैं कर दूँ गायब,
चींटी उसे बनाऊँ।
मछली में दो पंख लगाकर,
नभ में उसे उड़ाऊँ।

और कभी खुद चिड़िया बनकर,
फुदक-फुदक उड़ जाऊँ।
रंग-बिरंगी तितली बनकर,
फूली नहीं समाऊँ।

प्यारी कोयल बनकर कुहुकूँ,
गीत मधुर मैं गाऊँ।
बन जाऊँ मैं मोर और फिर,
नाँचूँ, मेघ बुलाऊँ।

चाँद सितारों के संग खेलूँ,
घर पर उन्हें बुलाऊँ।
सूरज दादा के पग छूकर,
धन्य-धन्य हो जाऊँ।

अपने घर को, गली नगर को,
कचरा-मुक्त बनाऊँ।
पर्यावरण शुद्ध करने को,
अनगिन वृक्ष लगाऊँ।

गंगा की अविरल धारा को,
पल में स्वच्छ बनाऊँ।
हरी-भरी धरती हो जाए,
चुटकी अगर बजाऊँ।

पर जादू तो केवल धोखा,
कैसे सच कर पाऊँ।
अपने मन की व्यथा-कथा को,
कैसे किसे सुनाऊँ।
***  
-आनन्द विश्वास

Thursday, 17 August 2017

*पाँच-सात-पाँच*

1. 
हमने माना
पानी नहीं बहाना
तुम भी मानो।
2.
छेड़ोगो तुम
अगर प्रकृति को
तो भुगतोगे।
3.
जल-जंजाल
न बने जीवन का
जरा विचारो।
4.
सूखा ही सूखा
क्यों है चारों ओर
सोचो तो सही।
5.
पानी या खून
हर बूँद अमूल्य
मत बहाओ।
 6.
खून नसों में
बहता अच्छा, नहीं
सड़क पर।
7.
सुनो सब की
सोचो समझो और
करो मन की
8.
घड़ी की सुईं
चलकर कहती
चलते रहो।
9.
रोना हँसना
बोलो कौन सिखाता
खुद आ जाता।
10.
सूखा ही सूखा
प्यासा मन तरसा
हुआ उदासा।
11.
भ्रष्टाचार से
देश को बचाएंगे
संकल्प करें।
12.
आतंकवाद
समूल मिटाना है
मन में ठानें।
13.
नैतिक मूल्य
होते हैं सर्वोपरि
मन से मानें।
14.
गेंहूँ जौ चना
कैसे हो और घना
हमें सोचना।
15.
मन की बात
सोचो, समझो और
मनन करो।
16.
देश बढ़ेगा
अपने दम पर
आगे ही आगे।
17.
अपना घर
तन-मन-धन से
स्वच्छ बनाएं।
18.
विद्या मन्दिर
नारों का अखाड़ा है
ये नज़ारा है।
19.
सब के सब
एक को हटाने में
एक मत हैं।
20.
पहरेदार
हटे, तो काम बने
हम सब का।
21.
नहीं सुहाते
हमको दोनों घर
बिन कुर्सी के।
22.
नारी सुरक्षा
आकाश हुआ मौन
मत चिल्लाओ।
23.
सूखा ही सूखा
बादल हैं लाचार
रोती धरती
24.
दीप तो जले
उजाला नहीं हुआ
दीप के तले।
25.
जागते रहो
कह कर, सो गया
पहरेदार।
-आनन्द विश्वास

Friday, 28 October 2016

*इस बार दिवाली सीमा पर*



इस बार दिवाली सीमा पर,
है खड़ा  मवाली  सीमा पर।
इसको  अब  सीधा करना है,
इसको अब  नहीं सुधरना है।
इनके  मुण्डों  को  काट-काट,
कचरे के संग फिर लगा आग।
गिन-गिन कर बदला लेना है,
हम  कूँच  करेंगे  सीमा  पर।
ये  पाक  नहीं,  ना पाकी  है,
चीनी, मिसरी-सा  साथी है।
दोनों की  नीयत  साफ नहीं,
अब करना इनको माफ नहीं।
इनकी  औकात   बताने  को,
हम, चलो  चलेंगे सीमा पर।
दो-चार  लकीरें   नक्शे  की,
बस  हमको  जरा बदलना है।
भूगोल  बदलना   है   हमको,
इतिहास स्वयं लिख जाना है।
आतातायी का  कर  विनाश,
फिर धूम-धड़ाका सीमा पर।
...आनन्द विश्वास 

Sunday, 16 October 2016

*अब सरदी की हवा चली है*

अब सरदी की हवा चली है,  
गरमी अपने  गाँव  चली है।
कहीं रजाई या फिर कम्बल,
और कहीं है  टोपा  सम्बल।
स्वेटर  कोट  सभी  हैं  लादे,
लड़ें  ठंड   से   लिए  इरादे।
सरदी आई,  सरदी  आई,
होती  चर्चा  गली-गली  है।
कम्बल का कद बौना लगता,
हीटर  एक खिलौना लगता।
कोहरे ने  कोहराम  मचाया,
पारा   गिरकर  नीचे आया।
शिमले से  तो  तोबा-तोबा,
अब दिल्ली की शाम भली है
सूरज की  भी  हालत खस्ता,
गया   बाँधकर  बोरी-बस्ता।
पता  नहीं, कब तक  आएगा,
सबकी  ठंड  मिटा   पाएगा।
सूरज   आए   ठंड  भगाए,
सबको लगती धूप भली है।
गरमी  हो तो, सरदी भाती,
सरदी  हो तो, गरमी भाती।
और कभी पागल मनवा को,
मस्त हवा  बरसाती  भाती।
चाबी  है  ऊपर  वाले  पर,
अपनी मरजी कहाँ चली है।
-आनन्द विश्वास

Thursday, 7 July 2016

नभ में उड़ने की है मन में.


नभ में उड़ने की  है  मन में,
उड़कर पहुँचूँ नील गगन में।

काश,  हमारे  दो  पर  होते,
हम  बादल  से  ऊपर  होते।
तारों  के   संग  यारी  होती,
चन्दा  के   संग  सोते  होते।
बिन पर सबकुछ मन ही मन में,
नभ में उड़ने की  है  मन में।

सुनते  हैं   बादल  से  ऊपर,
ढ़ेरों  ग्रह-उपग्रह   होते   हैं।
उन पर जाते,  पता  लगाते,
प्राणी, क्या उन पर होते हैं।
और धरा से, कितने  उन में,
नभ में उड़ने की  है  मन में।

बहुत बड़ा ब्रह्माण्ड हमारा,
अनगिन सूरज,चन्दा, तारे।
कितने,  सूरज दादा  अपने,
कितने, मामा  और  हमारे।
कैसे  जानूँ,  हूँ  उलझन  में,
नभ में उड़ने की है  मन में।

दादा-मामा  के  घर  जाते,
उनसे मिलकर ज्ञान बढ़ाते।
दादी  के  हाथों  की  रोटी,
दाल,भात औ  सब्जी खाते।
लोनी, माखन, मट्ठा मन में।
नभ में उड़ने की है मन में।

...आनन्द विश्वास

Tuesday, 5 July 2016

मछली कैसे जीती जल में.

मछली कैसे  जीती जल में,
टीचर से  पूछूँगी  कल  मैं।

जीना चाहूँ  जो मैं  जल में,
जान सकूँगी उसका हल मैं।

जो ऐसा सम्भव  हो पाया,
तो मैं  घूमूँगी  जल-थल में।

मछली के  संग होगी यारी,
दोस्त  बनेंगे  ढ़ेरों  पल  में।

सात  समुन्दर  पार करूँगी,
छू  पाऊँगी  सागर-तल  मैं।

सागर का अनमोल,खजाना,
जा  देखूँगी  अपने  बल, मैं।


...आनन्द विश्वास