Monday, 6 April 2020

एक आने के दो समोंसे


बात उन दिनों की है जब एक आने के दो समोंसे आते थे और एक रुपये का सोलह सेर गुड़। अठन्नी-चवन्नी का जमाना था तब। प्राइमरी स्कूल के बच्चे पेन-पेन्सिल से कागज पर नही, बल्कि नैज़े या सरकण्डे की बनी कलम से खड़िया की सफेद स्याही से, लकड़ी के तख्ते की बनी हुई पट्टी पर लिखा करते थे।
वो भी क्या दिन थे जब पट्टी को घुट्टे से घिस-घिसकर चिकना किया जाता था। उस लिखने में मजा ही कुछ और था। पट्टी की एक तरफ एक से सौ तक की गिनती और दूसरी तरफ दो से दस तक के पहाड़े लिखकर मास्टर जी को दिखाकर, उसे पानी से धो दिया जाता था। और फिर पट्टी की मुठिया को पकड़कर हवा में जोर-जोर से हिला-हिलाकर सुखाया जाता था। और साथ ही साथ गाने का आनन्द भी तो उतना ही अच्छा लगता था जब क्लास के सभी बच्चे गाना गाते थे और गाना गा-गाकर पट्टी सुखाते थे। सब को याद था ये गाना….
सुख-सुख   पट्टी, चन्दन  घुट्टी।
राजा   आये,  महल   बनाया।
महल के  ऊपर  झप्पड़ छाया।
झप्पड़ गया टूट, पट्टी गई सूख।
हाँलाकि इस गाने का अर्थ तो आज तक मुझे पता नहीं चल पाया। पर हाँ, इतना जरूर था कि पट्टी सूख तो जरूर जाती थी। पता नहीं, हो सकता है, इसके पीछे कोई तर्क रहा हो। पर कोई बात तो जरूर ही रही होगी अपने बुगुर्जों के कार्य करने की शैली या बुध्दिमत्ता पर जरा भी संशय करना या प्रश्न उठाना, उचित सा नहीं लगता। शायद बच्चों को गाना सिखाने उद्देश्य रहा हो। आज जैसे गाने तब शायद नहीं थे। जौनी-जौनी यस पापा या बाबा ब्लैक शीप या टिंक्वल-टिंक्वल लिटल स्टार जैसे गानों का प्रचलन ही कहाँ था तब। अंग्रेज और अंग्रेज़ियत का प्रभाव, इतना तब नहीं था जितना अब और आज है। तब हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तानियत की बू गर्व मानी जाती थी, जितनी कि आज अंग्रेज़ियत की बू।
और जब पट्टी सूख जाती, तो उसे घुट्टे से घिस-घिस कर चिकना करने और फिर कलम से लिखने में जो आनन्द आता था वह आनन्द आज के लैपटॉप या कम्प्यूटर की की-बोर्ड पर अँगुलियाँ घुमाने में कहाँ? नैज़े की कलम से,खड़िया की सफेद स्याही को बुदक्के में भर कर, बार-बार कलम को डुबा कर एक-एक अक्षर को मोती-सा टाँकना, कितना मन-भावन होता था। और वह भी टाट के बोरे पर बैठ कर। कोई फर्नीचर नहीं, कोई सीटिंग एरेंजमेंट नहीं, बस जहाँ बोरा बिछा दिया, बन गया वहीं क्लास-रूम।
और रिसेस के बाद तो पूरे स्कूल की सभी कक्षाऐं दो भागों में बँट जाती थीं और फिर शुरू हो जाता था, दो से पच्चीस तक के पहाड़ों का बोलना। एक टीम बोलती, दो एकम् दो तो दूसरी बोलती, दो दूना चार...और इसके बाद फिर ढ़इय्या, अध्धा, पौना और सबैय्या। सबको सब कुछ तोते की तरह रटे पड़े थे। रोज़ाना जो बोलने पड़ते थे। दिमाग ही कैलक्यूलेटर और कम्प्यूटर बन जाता था।
गलती करने पर पाँच सन्टी की सजा तो सामान्य सजा ही मानी जाती थी, शीशम की सन्टी का ही प्रचलन था तब और हर सन्टी पर चींख सी निकल जाती थी बालकों की। पर मज़ाल है कि कोई वाली आ कर कह दे कि मास्टर जी आपने मेरे बालक को क्यों मारा? हाँ, ऐसा तो जरूर कहने आते थे कि मास्टर जी अगर ये कोई गलती करे तो इसे मार-मार कर सुधारिये। इसे अपना बच्चा ही समझिये। आत्मीयता भी थी तब और कर्तव्य का बोध भी।
और इतना ही नहीं, इससे बड़ी सजा होती थी मुर्गा बनाने की। यानी अगर गलती करोगे तो फिर मनुष्य योनी से मुर्गा-योनी में प्रवेश। और कुछ समय के लिये मुर्गा बना दिया जाता था। और कभी-कभी तो निर्जीव कुर्सी भी बना दिया जाता था और उस बाल-कुर्सी पर किसी बालक को बैठा भी दिया जाता था या फिर सिर पर ईंट रख दी जाती थी और ईंट गिरने पर फिर वही पाँच सन्टी की सजा। जी हाँ, वही शीशम की सन्टी। चरित्र-निर्माण और न्याय के साथ कोई समझौता नही किया जाता था। निष्पक्ष न्याय होता था मास्टर जी के दरबार में।
मैं पाँचवीं कक्षा में पढ़ता था। यूँ तो मेरी गिनती स्कूल के अच्छे बच्चों में होती थी और सभी शिक्षकों का स्नेह मेरे ऊपर रहता था फिर भी मुझे सबसे अधिक डर लगता था तो वो थे मेरे स्कूल के हैड-मास्टर साहब और हैड मास्टर साहब, अगर सबसे अधिक किसी को प्यार करते थे, तो वह मैं था।
कारण मुझे पता नहीं, पर मैं तो यह ही मानता था कि मैं पढ़ने में होशियार हूँ और हैड मास्टर जी का सब काम दौड़-दौड़ कर कर देता हूँ। मसलन चॉक ले कर आना या बोर्ड को साफ करके रखना या फिर जब कभी उनका आदेश होता तो बाहर लगे हैन्ड-पम्प से ठन्डे-ठन्डे पानी का गिलास भर कर ले आना। पानी तो वे अक्सर मेरे हाथ का ही पिया करते थे। और मैं भी पानी लाने में सफाई का बहुत ध्यान रखता था शायद इसलिये या और कुछ। पर कारण का मुझे पता नहीं।
उन्हीं दिनों म्युनिस्पलटी के चुनाव होने वाले थे और प्राइमरी स्कूलस् म्युनिस्पल बोर्ड के अन्तर्गत आते थे। चुनाव सम्बन्धी कार्य प्राइमरी स्कूलस् के टीचर्स और हैड-मास्टर्स को सोंपे गये थे। और सभी शिक्षकों को निर्धारित वार्ड में जा कर चुनाब की वोटिंग पर्चियों को बाँटना तथा अन्य कार्य सोंपे गये थे। हैड मास्टर साहब को जो वार्ड सोंपा गया था उसी वार्ड में मेरा घर था। और यह सब काम स्कूल छूटने के बाद ही करना होता था।
शाम का समय था घर के बाहर चौक में मैं अपने साथियों के साथ खेल रहा था। और इसी समय हैड मास्टर साहब का आना हुआ, हैड मास्टर साहब को देखते ही खेल तो तुरन्त बन्द हो गया और सभी साथी, जिज्ञासा-वश हैड मास्टर साहब के पास पहुँच गये। पर मैं दौड़ कर घर पहुँचा और माता जी को बताया कि मेरे स्कूल के हैड मास्टर साहब बाहर आये हुये हैं अतः वे घर से बाहर न निकलें और घर के अन्दर ही रहें।
उन दिनों पर्दा-प्रथा का प्रचलन था। और मेरे संस्कारों के हिसाब से मेरी माता जी को हैड मास्टर साहब के सामने जाना सर्वथा अनुचित ही था। अतः मैं अपनी माता जी के पैरों से लिपट कर धक्का देते-देते उन्हें दरवाजे के अन्दर ले जाने का प्रयास करने लगा। यह सोचकर कि अगर मेरे हैड मास्टर साहब ने मेरी माता जी को देख लिया तो लोग क्या कहेंगे।
और उधर जितनी तेजी से मैं माता जी के पैरों से लिपट कर उन्हें घर के अन्दर की ओर धक्का दे रहा था उससे दुगनी तेज गति से हैड मास्टर साहब मेरी माता जी की ओर बढ़े आ रहे थे। इतनी स्फूर्ति मैंने हैड मास्टर साहब में कभी भी नहीं देखी थी। इस दौड़ में, मैं तो हार ही गया और हैड मास्टर साहब अपने लक्ष्य पर पहले पहुँचने में सफल हो गये। और हैड मास्टर साहब ने झुक कर माता जी के पैर छू ही लिये। गले से लगा लिया था हैड मास्टर साहब को, माता जी ने। आशीर्वाद की बर्षा हो रही थी।
मैं कभी हैड मास्टर साहब को, तो कभी माता जी को, और कभी अपने आप को देख रहा था। क्या माज़रा है कुछ भी तो समझ में नहीं आ पा रहा था। मेरे स्कूल के हैड मास्टर साहब, जिनकी छाया मात्र से ही, मैं थर-थर काँपने लगता था, वे हैड मास्टर साहब, मेरी माता जी के पैर छूकर आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं।
समझ नहीं आ रहा था कि मेरे हैड मास्टर साहब धन्य हैं या मेरी माता जी धन्य हैं या फिर मैं।
पर धन्य तो हमारी भारतीय संस्कृति है जिसने हमें ऐसे संस्कार दिये। हम उन्हें भूल ही जायें तो इसमें संस्कृति का क्या दोष।
"कैसे हो बेटा, सब ठीक-ठाक है न। इधर काफी समय से मिले नहीं। कोई परेशानी तो नहीं है।" माता जी ने बड़े ही स्नेहिल भाव से हैड मास्टर साहब से पूछा।
"बस, माता जी आपका आशीर्वाद है। गाँव गया था, बेटी की शादी कर दी है, लड़का गाँव में ही लेखपाल है। बाकी सब ठीक है।" हैड मास्टर साहब ने माता जी से कहा।
"चलो अच्छा हुआ बेटा, एक जिम्मेदारी तो पूरी हुई। कभी-कभार तो घूम जाया कर, चिन्ता बनी रहती है।" माता जी ने प्यार भरे लहज़े में कहा।
माता जी से मिलने के बाद हैड मास्टर साहब, अपने चुनाव काम में व्यस्त हो गये। मुहल्ले में चुनाव की पर्चियाँ बाँट कर चले गये। पर आज तक वे मेरे मन से नहीं जा सके और विनम्रता का पाठ सिखा गये। हैड मास्टर साहब ने मेरी माता जी के पैर क्या छुए, मेरे मन को ही छू गये।
मैंने माता जी से पूछा तो उन्होंने बताया-"बेटा, तेरे हैड मास्टर साहब को, तेरे पिता जी ने पढ़ाया था इसलिये वे मेरे पैर छूते हैं। मैं उनकी गुरु-माँ हूँ न।"
और तब मैं समझ पाया था गुरू और माँ की महिमा को। सच में, माँ तो आखिर माँ ही होती है।
दूसरे दिन स्कूल पहुँच कर सबसे पहले मैंने गुरू जी के पैर छुए थे, सच में मैंने पैर ही नहीं, उनका हृदय छू लिया था। भरी क्लास में गोदी में उठाकर, गले से लगा लिया था हैड मास्टर साहब ने। बज्र सा हिमालय पानी-पानी होते देखा था उस दिन मैंने और मेरी आँखों से गंगा ही तो वह निकली थी और तब जाना था मैंने कि आशीर्वाद की गंगा तो चरणों से ही निकलती है और धारण की जाती है ललाट पर।
*** 


Thursday, 30 January 2020

"आया मधुऋतु का त्योहार"

खेत-खेत   में   सरसों  झूमें,  सर-सर    वहे   वयार।
मस्त पवन के संग-संग आया, मधुऋतु का त्योहार।
धानी  रंग  से  रंगी  धरा,
परिधान   वसन्ती  ओढ़े।
हर्षित मन  ले  लजवन्ती,
मुस्कान  वसन्ती    छोड़े।
चारों  ओर   वसन्ती  आभाहर्षित   हिया  हमार।
मस्त पवन के संग-संग आया, मधुऋतु का त्योहार।
सूने-सूने   से  पतझड़   को,
आज वसन्ती  प्यार मिला।
प्यासे-प्यासे  से  नयनों को,
जीवन का  आधार  मिला।
मस्त  पवन हैमस्त  गगन हैमस्ती का अम्बार।
मस्त पवन के संग-संग आया मधुऋतु का त्योहार।
ऐसा  लगे   वसन्ती  रंग  से,
धरा की हल्दी आज चढ़ी हो।
ऋतुराज  ब्याहने आ  पहुँचा,
जाने की जल्दी आज पड़ी हो।
और कोकिला  कूँक-कूँककर, गाए मंगल ज्योनार।
मस्त पवन के संग-संग आया मधुऋतु का त्योहार।
पीली  चूनर ओढ़  धरा अब,
कर   सोलह   श्रृंगार   चली।
गाँव-गाँव    में   गोरी   नाँचें,
बाग-बाग    में  कली-कली।
या  फिर  नाँचें   शेषनाग पर, नटवर  कृष्ण  मुरार।
मस्त पवन के संग-संग आया मधुऋतु का त्योहार।
-आनन्द विश्वास

Thursday, 4 July 2019

मेरा बाल-उपन्यास "देवम" अब मणीपुरी में भी..

मित्रो,
मेरा बाल-उपन्यास देवम, अब मणीपुरी में भी उपलब्ध है। देवम बाल उपन्यास को के.टी. पब्लिकेशन, इम्फाल (मणीपुर) द्वारा प्रकाशित किया गया है और जिसका अनुवाद श्री खाड़ेम्बम तोमचौ जी के द्वारा किया गया है। हिन्दी बाल-उपन्यास को मणीपुरी भाषा में अनुवाद कर मणीपुरी भाषा-भाषी बच्चों और साहित्य-प्रेमी पाठकों तक पहुँचाने का, श्री खाड़ेम्बम तोमचौ जी का यह प्रयास निश्चय ही सराहनीय कार्य है। पुस्तक विमोचन के कुछ चित्रों को साझा कर रहा हूँ।
धन्यवाद।
-आनन्द विश्वास

Saturday, 9 February 2019

"ऐसे जग का सृजन करो, माँ"

ऐसे  जग का  सृजन  करो, माँ।
अविरल  वहे  प्रेम  की सरिता,
मानव - मानव   में  प्यार  हो।
फूलें-फलें   फूल   बगिया  के,
काँटों   का   हृदय  उदार  हो।
जिस मग में कन्टक हों पग-पग,
ऐसे  मग  का  हरण  करो, माँ।
ऐसे  जग का  सृजन  करो, माँ।
पर्वत  सागर  में    समता  हो,
भेद-भाव  का  नाम  नहीं  हो।
दौलत  के   पापी   हाथों   में,
बिकता  ना  ईमान  कहीं  हो।
लंका  में   सीता  को  भय  हो,
ऐसे  जग का  सृजन करो, माँ।
ऐसे  जग का  सृजन करो, माँ।
परहित  का  आदर्श  जहाँ हो,
घृणा-द्वेश-अभिमान  नहीं हो।
मन-वचन-कर्म का शासन हो,
सत्य जहाँ  बदनाम  नहीं हो।
जन-जन  में   फैले  खुशहाली,
घृणा अहम् का दमन करो माँ।
ऐसे  जग का सृजन  करो, माँ।
धन  में   विद्या  अग्रगण्य  हो,
सौम्य    मनुज    श्रृंगार   हो।
सरस्वती, दो  तेज किरण-सा,
हर   उपवन   उजियार   हो।
शीतल,स्वच्छ,समीर सुरभि हो,
उस उपवन का वपन करो, माँ।
ऐसे  जग का  सृजन  करो, माँ।
-आनन्द विश्वास

Tuesday, 1 January 2019

"पीछे मुड़कर कभी न देखो"

पीछे  मुड़कर कभी न  देखो, आगे ही तुम  बढ़ते जाना।
उज्ज्वल कल है तुम्हें बनाना, वर्तमान ना व्यर्थ गँवाना।
संघर्ष आज तुमको करना है,
महनत में  तुमको  खपना है।
दिन और रात  तुम्हारे अपने,
कठिन  परिश्रम  में तपना है।
फौलादी आशाऐं लेकर, तुम  लक्ष्य प्राप्त करते जाना।
पीछे मुड़कर कभी न देखो, आगे ही तुम बढ़ते जाना।
इक-इक पल है बड़ा कीमती,
गया समय वापस ना आता।
रहते  समय  न जागे तुम तो,
जीवन  भर  रोना  रह जाता।
सत्यवचन सबको खलता है,मुश्किल है सच को सुन पाना।
पीछे  मुड़कर  कभी न  देखो, आगे  ही तुम  बढ़ते जाना।
बीहड़  बीयावान  डगर  पर,
कदम-कदम पर शूल मिलेंगे।
इस  छलिया  माया  नगरी में,
अपने  ही  प्रतिकूल  मिलेंगे।
गैरों की तो बात छोड़ दो, अपनों  से मुश्किल  बच पाना।
पीछे  मुड़कर कभी न  देखो, आगे  ही  तुम  बढ़ते जाना।
झंझावाती  प्रबल  पवन  हो,
तुमको  कहीं  नहीं रुकना है।
बाधाऐं  हों   सिर  पर हावी,
फिर भी तुम्हें नहीं झुकना है।
मन में  दृढ़  विश्वास  लिए, संकल्प  सिद्ध  करते जाना।
पीछे  मुड़कर कभी न  देखो, आगे ही तुम  बढ़ते जाना।
नदियाँ  कब   पीछे  मुड़तीं हैं,
कल-कल करतीं आगे बढ़तीं।
समय-चक्र  आगे  ही  बढ़ता,
घड़ी कहाँ कब उल्टी चलतीं।
पल-पल बदल रहा है सब कुछ,संग समय के चलते जाना। 
पीछे  मुड़कर  कभी न  देखो, आगे  ही  तुम  बढ़ते जाना।
...आनन्द विश्वास


Sunday, 11 February 2018

*बेटी-युग*

सतयुग, त्रेता, द्वापर बीता, बीता कलयुग कब का,
बेटी  युग  के  नए  दौर  में,  हर्षाया   हर   तबका।
बेटी-युग में खुशी-खुशी है,
पर महनत के साथ बसी है।
शुद्ध-कर्म  निष्ठा का संगम,
सबके मन में दिव्य हँसी है।
नई  सोच  है,  नई चेतना, बदला  जीवन  सबका,
बेटी  युग  के  नए  दौर  में,   हर्षाया   हर  तबका।
इस युग में  ना  परदा बुरका,
ना तलाक, ना गर्भ-परिक्षण।
बेटा   बेटी,    सब   जन्मेंगे,
सबका   होगा  पूरा   रक्षण।
बेटी की किलकारी सुनने, लालायित मन सबका।
बेटी-युग  के  नए  दौर  में,   हर्षाया   हर  तबका।
बेटी भार  नहीं  इस  युग में,
बेटी   है  आधी   आबादी।
बेटा है कुल का दीपक, तो,
बेटी है दो  कुल की  थाती।
बेटी तो  है शक्ति-स्वरूपा, दिव्य-रूप है  रब  का।
बेटी-युग  के  नए  दौर  में,   हर्षाया   हर   तबका।
चौके   चूल्हे  वाली  बेटी,
बेटी-युग में कहीं  न होगी।
चाँद  सितारों से  आगे जा,
मंगल पर मंगलमय  होगी।
प्रगति-पंथ पर  दौड़ रहा है,  प्राणी हर मज़हब का।
बेटी  युग  के  नए  दौर  में,  हर्षाया   हर   तबका।
***
...आनन्द विश्वास