Tuesday, 21 April 2015

"बेटा-बेटी सभी पढ़ेंगे"


नानी वाली कथा-कहानी, अब के जग में हुई पुरानी।
बेटी-युग के नए दौर की, आओ लिख लें नई कहानी।
बेटी-युग     में    बेटा-बेटी,
सभी   पढ़ेंगे,  सभी  बढ़ेंगे।
फौलादी    ले   नेक  इरादे,
खुद अपना इतिहास गढ़ेंगे।
देश  पढ़ेगा, देश  बढ़ेगा, दौड़ेगी अब, तरुण जवानी।
बेटी-युग के नए दौर की, आओ लिख लें नई कहानी।
बेटा  शिक्षित, आधी शिक्षा,
बेटी   शिक्षित  पूरी  शिक्षा।
हमने सोचा, मनन करो तुम,
सोचो समझो  करो समीक्षा।
सारा जग शिक्षामय करना, हमने सोचा मन में ठानी।
बेटी-युग के नए दौर की, आओ लिख लें नई कहानी।
अब कोई ना अनपढ़ होगा,
सबके  हाथों पुस्तक होगी।
ज्ञान-गंग  की पावन धारा,
सबके आँगन तक पहुँचेगी।
पुस्तक और पैन की शक्ति,जगजाहिर जानी पहचानी।
बेटी-युग के नए दौर की, आओ  लिख लें नई कहानी।
बेटी-युग   सम्मान-पर्व  है,
ज्ञान-पर्व  है,  दान-पर्व है।
सब सबका सम्मान करे तो,
जीवन  का  उत्थान-पर्व है।
सोने की  चिड़िया बोली है, बेटी-युग की हवा सुहानी।
बेटी-युग के नए दौर की,आओ लिख लें नई कहानी।
-आनन्द विश्वास


Tuesday, 24 February 2015

*वाणी पर संयम*

*वाणी पर संयम*
(प्रस्तुत कहानी मेरे उपन्यास देवम बाल-उपन्यास
से ली गई है। जिसे डायमंड बुक्स,दिल्ली
से प्रकाशित किया गया है।)
...आनन्द विश्वास

उस दिन देवम की कक्षा में टीचर पढ़ा रही थीं, कोई गम्भीर विषय चल रहा था। लेकिन पीछे दो छात्र आपस में बात करने में इतने तल्लीन थे कि वे भूल ही गये कि वे कक्षा में बैठे हैं । 
बातें करने के कारण पढ़ाई में व्यवधान उत्पन्न हो रहा था। एक दो बार टीचर ने उन्हें टोका भी, पर उनका वार्तालाप थोड़ी देर के लिये रुका और फिर चालू हो गया।
टीचर से न रहा गया, उन्होंने उन दोनों छात्रों को इंगित करते हुय़े कहा-बच्चो ! आज मैं मानव शरीर के उन तीन अंगों के विषय में बताती हूँ, जो शिक्षा प्रक्रिया के आदान-प्रदान के मुख्य माध्यम होते हैं। यानि कि वे तीन मानव अंग जो ज्ञान के आदान-प्रदान में काम आते है।
उन्होंने बताया कि ईश्वर ने हमें तीन अंग दिये हैं जिनके माध्यम से हम ज्ञान प्राप्त करते हैं अथवा ज्ञान देते हैं और वे हैं, आँख, कान और मुँह।
भगवान ने हमें दो आँखें दी हैं और उनका काम केवल देखना है यानि कि चीज़े दो और काम एक। और यदि आँखों में कुछ कमी हो तो उसकी सहायता के लिये चश्मे भी।
दूसरा अंग कान, कान दो और काम एक। सुनना और केवल सुनना। और यदि कुछ कमी हो तो सहायता के लिये वैज्ञानिक उपकरण भी।
और तीसरा अंग है मुँह, जिसकी सहायता के लिये न तो कोई वैज्ञानिक उपकरण है और न कोई दूसरा विकल्प। मुँह, एक और केवल एक, और काम दो। बोलना और खाना खाना।
उसमें भी बोलने का काम जीभ करती है जिस पर ईश्वर ने बत्तीस पहरेदार बैठाये हुये हैं वे भी पत्थर के कठोर। बेचारी कोमल जीभ और पहरेदार पत्थर के। अगर जरा सा भी उल्टा-सीधा बोला तो समझो खैर नहीं।
यानी देखने और सुनने पर कोई अंकुश नहीं, जितना चाहो उतना देखो और सुनो। पर बोलने पर अंकुश। अर्थात वाणी पर संयम। बहुत सोच समझ कर बोलो। कुछ भी बोलने से पहले सौ-सौ बार सोचो और फिर बोलो।
क्योंकि शब्द-बाण एक बार मुँह में से निकलने के बाद फिर कभी वापस नहीं आता। अर्थात बिना सोचे समझे बोलना, विपत्ति-निमंत्रण और मूर्खता से कम कुछ भी नहीं।
जीभ पर जब कोई घाव हो जाता है तो वह बहुत जल्दी ठीक हो जाता है। पर ध्यान रहे जीभ के द्वारा शब्दों से जो घाव होता है तो वह कभी भी नहीं भर पाता है।
आदमी मर जाता है लेकिन शब्द कभी भी नहीं मरता। शब्द सदैव आकाश में ही विद्यमान रहता है। और शब्द-बाण से आहत मन का घाव कभी भी नहीं भर पाता है। जीवन पर्यन्त नहीं।
द्रोपदी के शब्द-बाण ने ही तो कुरुक्षेत्र की धरती को खून से लथपथ कर दिया था। ऐसी खून की होली खेली गई, जिसे मानवता के इतिहास में कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। हाँउस होली का नाम है महाभारत।
द्रोपदी ने दुर्योधन से अंधे के अंधे ही होते हैं।नहीं कहा होता तो शायद महाभारत नहीं हुआ होता और न ही चीर-हरण जैसी अप्रिय और शर्मसार कर देने वाली घटना हुई होती।
बुद्धिमान व्यक्ति बोलने से पहले दस बार सोचते हैं, बोलने के बाद नहीं। और मूर्ख व्यक्ति पहले बोलते हैं और फिर सोचतें हैं, अरे ! मैंने यह क्या बोल दिया। पर बाद में अफसोस से क्या फायदा ?
अब आपको ही निर्णय करना है कि आप कौन हैं ? बुद्धिमान या फिर मूर्ख।
और गाँधी जी ने भी तो इन्हीं तीन अंगों के कार्यों और महत्व को तीन बन्दरों के माध्यम से समझाया है। उनके अनुसार - बुरा न देखो, बुरा न सुनो और ना ही बुरा बोलो। यानि, आँख, कान और मुँह। देखना, सुनना और बोलना। और इन तीनों अंगों का सही उपयोग तो यही है कि अच्छा देखना, अच्छा सुनना और अच्छा बोलना।
आँख और कान के माध्यम से हम बाहर की वस्तुओं और शब्दों को देखते और सुनते हैं। जिनका मंथन मन में होता है। जिनका प्रभाव हमारे मन पर पड़ता है। जिनसे हमें जानकारियाँ प्राप्त होती हैं। और बोलने से अन्दर की जानकारियाँ बाहर जाती हैं। आप जो जानते हैं वही बोल सकते हैं। 
मैं आप से ही पूछती हूँ, आप क्या बोल सकते हैं? आप केवल वही बोल सकते हैं जो आप जानते हैं। यानि आप जो जानते हैं वो यहाँ बताने आते हैं या कुछ जानने और सीखने के लिये आते हैं ?
और जानने का काम तो आँख और कान करते हैं। और इन्हीं दो अंगों के माध्यम से आदमी ज्ञान प्राप्त करता है। अत: विद्यार्थियों को तो आँख और कान का ही अधिक उपयोग करना चाहिये। बोलने से ज्ञान प्राप्त नहीं होता। बोलने से तो आप अपना ज्ञान दूसरों को दे सकते हैं, प्राप्त नहीं कर सकते।
और विशेषकर तो जो लोग कुछ सीखना या जानना चाहते हैं उन्हें तो कम से कम या ना के बराबर ही बोलना चाहिये। और जब छात्र कक्षा में बैठ कर पढ़ाई के समय में बोले, बात-चीत करे, तो उसका क्या करना चाहिये ?
इससे तो वह न केवल अपना नुकशान कर रहा है वल्कि उसके कारण पूरी कक्षा की पढ़ाई का नुकशान होता है। क्या ऐसे छात्र दण्ड के अधिकारी नही हैं ? क्यों न उन्हें कुछ दण्ड मिलना चाहिये ?
टीचर इतना ही कह पाई थी कि घंटी बज गई। टीचर ने कहा-आगे मैं कल बताऊँगी। और इतना कह कर टीचर अपना पर्स ले कर, दूसरी कक्षा में चली गईं।
टीचर के जाते ही पूरी कक्षा में एक सन्नाटा छा गया फिर कुछ छात्रों ने उन बातें करने वाले छात्रों को गलत बताया। और कहा कि कक्षा में इस प्रकार बात करने से सभी की पढाई का नुकसान होता है।
 देवम ने भी उन दोनों छात्रों को कक्षा के बाहर बुला कर समझाया और कहा कि यदि तुम अपना मन पढ़ने में नहीं लगाओगे और व्यर्थ की बातों में अपना समय बरबाद करोगे तो तुम फेल भी हो सकते हो और तुम्हें स्कूल से निकाला भी जा सकता है।
अपने भविष्य को बिगाड़ कर तुम्हें कुछ नही मिलने वाला। इस कार्य के लिये तुम्हें टीचर से क्षमा माँगनी चाहिये। और अपना मन केवल पढने में लगाना चाहिये।
देवम की बात उन शैतान, बातूनी छात्रों को भी पसंद आई और उन्होंने कहा कि कल टीचर के कक्षा में आने पर क्षमा माँगेंगे और भविष्य में हम कभी भी कक्षा में बात नहीं करेंगे। और साथ ही यह भी कहा कि भविष्य में हम कभी भी कोई ऐसा काम नहीं करेंगे जिससे अन्य छात्रों का कोई नुकसान हो।
दूसरे दिन तो बस सबका एक ही इंतजार था कि कब सातवाँ पीरियड आये और दोनों छात्र टीचर से माफी मागें।
पर टीचर के आने पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ बल्कि टीचर ने आगे पढाना शुरू कर दिया। जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो। सभी छात्र हैरान थे। सभी छात्र तो ये सोच रहे थे कि आज टीचर उन छात्रों को जरूर ही सजा देगी। सब छात्र एक दूसरे से पूछते। पर क्या हुआ, यह रहस्य ही बना रहा।
और फिर कुछ दिनों के बाद, पता नहीं कैसे, कहाँ से, जब छात्रों को असलियत का पता चला तो छात्रों के मन में देवम के प्रति अपार सम्मान उत्पन्न हो गया। सभी ने देवम के विवेक पूर्ण निर्णय की खूब प्रशंसा की।
हुआ यह कि जब दोनों छात्रों ने देवम के समझाने पर अपनी गलती को स्वीकार कर लिया तो देवम ने अकेले में टीचर से बात की और सारी घटना को बताया और कहा कि दौनों छात्रों ने अपनी गलती को मान लिया है।
तो टीचर ने देवम से कहा-ठीक है, अब मैं कक्षा में किसी भी प्रकार की कोई चर्चा नहीं करूँगी और तुम उन छात्रों को समझा देना। और छात्रों को कह देना कि भविष्य में यदि इस प्रकार की कोई उद्दण्डता उन्होंने की तो उन्हें अवश्य दण्ड दिया जायेगा।
और इस प्रकार देवम ने उन छात्रों को सभी के सामने अपमानित होने से बचाया। और टीचर के द्वारा भी जब इस घटना की पुष्टि कर दी गई तो सभी छात्रों के मन में देवम के प्रति अपार श्रद्धा उत्पन्न हो गई।
देवम के इस विवेकपूर्ण कार्य की सभी ने खूब-खूब प्रशंसा की।
*****
...आनन्द विश्वास


Sunday, 25 January 2015

*मेरे देश की माटी सोना*

*मेरे देश की माटी सोना*
...आनन्द विश्वास 

मेरे  देश  की  माटी  सोना, सोने का  कोई काम ना,
जागो   भैया   भारतवासीमेरी   है   ये   कामना।
दिन तो  दिन है  रातों को  भी थोड़ा-थोड़ा जागना,
माता  के  आँचल  पर  भैयाआने  पावे  आँच  ना।

अमर धरा के  वीर सपूतो, भारत माँ  की  शान तुम,
माता  के  नयनों  के  तारे  सपनों  के  अरमान  तुम।
तुम  हो  वीर शिवा  के वंशज  आजादी  के  गान हो,
पौरुष की  हो खान  अरे तुम हनुमत से अनजान हो।

तुमको  है  आशीष  राम  का, रावण  पास    आये,
अमर  प्रेम  हो उर  में इतना, भागे  भय से  वासना।
मेरे  देश  की  माटी  सोना, सोने का  कोई काम ना।

आज देश का  वैभव रोता, मरु के नयनों  में पानी है,
मानवता  रोती है दर-दर, उसकी भी यही कहानी है।
उठ कर गले लगा लो तुम, विश्वास स्वयं ही सम्हलेगा,
तुम बदलो  भूगोल जरा, इतिहास  स्वयं ही बदलेगा।

आड़ी-तिरछी   मेंट  लकीरें,   नक्शा   साफ   बनाओ,
एक  देश हो, एक  वेश हो, धरती  कभी    बाँटना।
मेरे  देश  की  माटी  सोना,  सोने का  कोई काम ना।

गैरों का  कंचन  माटी  है, मेरे  देश  की  माटी सोना,
माटी  मिल   जाती  माटी  मेंरह  जाता  है  रोना।
माटी की खातिर मर मिटना माँगों को सूनी कर देना,
आँसू  पी-पी  सीखा  हमनेबीज  शान्ति  के  बोना।

कौन  रहा  धरती  पर  भैया, किस  के  साथ  गई  है,
दो  पल  का  है रैन बसेरा, फिर  हम सबको भागना।
मेरे  देश  की  माटी  सोना,  सोने का  कोई काम ना।

हम धरती  के लाल  और यह हम सब  का आवास है,
हम सब की हरियाली घरती, हम सब का आकाश है।
क्या हिन्दू, क्या  रूसी चीनी, क्या  इंग्लिश अफगान,
एक  खून  है सब का  भैया, एक  सभी  की  साँस  है।

उर को  बना  विशाल, प्रेम  का  पावन  दीप जलाओ,
सीमाओं  को बना  असीमितअन्तःकरण  सँवारना।
मेरे  देश  की माटी  सोना, सोने  का  कोई  काम ना।
जागो   भैया    भारतवासीमेरी   है   ये   कामना।

...आनन्द विश्वास


Friday, 23 January 2015

*आया मधुऋतु का त्योहार*

*आया मधुऋतु का त्योहार*

खेत-खेत   में   सरसों  झूमेसर-सर  वहे  वयार,
मस्त पवन के संग-संग आया मधुऋतु का त्योहार।
धानी  रंग  से  रंगी धरा,
परिधान   वसन्ती  ओढ़े।
हर्षित  मन  ले लजवन्ती,
मुस्कान   वसन्ती   छोड़े।
चारों  ओर  वसन्ती  आभाहर्षित  हिया  हमार,
मस्त पवन के संग-संग आया मधुऋतु का त्योहार।
सूने-सूने  पतझड़  को  भी,
आज वसन्ती प्यार मिला।
प्यासे-प्यासे  से नयनों को,
जीवन का  आधार मिला।
मस्त  गगन हैमस्त  पवन है, मस्ती  का अम्बार,
मस्त पवन के संग-संग आया मधुऋतु का त्योहार।
ऐसा   लगे  वसन्ती  रंग  से,
धरा की हल्दी आज चढ़ी हो।
ऋतुराज ब्याहने  आ पहुँचा,
जाने की जल्दी आज पड़ी हो।
और कोकिला  कूँक-कूँक  कर, गाये मंगल ज्योनार,
मस्त पवन के संग-संग आया मधुऋतु का त्योहार।
पीली चूनर ओढ़ धरा अब,
कर  सोलह  श्रृंगार  चली।
गाँव-गाँव  में  गोरी  नाचें,
बाग-बाग  में  कली-कली।
या फिर  नाचें  शेषनाग  पर, नटवर  कृष्ण  मुरार,
मस्त पवन के संग-संग आया मधुऋतु का त्योहार।
                         ....आनन्द विश्वास


Friday, 26 December 2014

*सूरज दादा कहाँ गए तुम*

*सूरज दादा कहाँ गए तुम*
...आनन्द विश्वास

सूरज  दादा  कहाँ   गए  तुम,
काह ईद  का  चाँद  भए तुम।
घना   अँधेरा,  काला - काला,
दिन निकला पर नहीं उजाला।
कोहरे   ने   कोहराम  मचाया,
पारा  गिर  कर  नीचे  आया।
काले  बादल   जिया   डराते,
हॉरर-शो  सा  दृश्य  दिखाते।
बर्षा  रानी   आँख   दिखाती,
झम झम झम पानी बरसाती।
काले – काले   बादल   आते,
उमढ़-घुमड़  कर शोर मचाते।
नन्हीं - नन्हीं  बूँद  कभी  तो,
कभी ज़ोर  की  बारिश लाते।
सर्द  हवाऐं,  शीत  लहर  है,
बे-मौसम  बरसात  कहर  है।
*टच मी नॉट* कहे अब पानी,
*बाहर ना जा* कहती  नानी।
कट - कट दाँत  बजाते बाजा,
मौसम  अपना  बैण्ड बजाता।
सड़क,  गली,  कूँचे,  चौबारे,
सब   सूने  हैं   ठंड  के  मारे।
फुट - पाथी,   बेघर,  बेचारे,
इन सबके  तो  तुम्हीं  सहारे।
अब तो सुन लो, सूरज दादा,
कल  आने  का  दे दो  वादा।
...आनन्द विश्वास

Thursday, 30 October 2014

*पर-कटी पाखी* (बाल-उपन्यास)

*पर-कटी पाखी*
(बाल-उपन्यास)
(जिसे डायमंड पॉकेट बुक्स, दिल्ली
से प्रकाशित किया गया है।)
...आनन्द विश्वास
प्रस्तावना
बालक के माता और पिता, दो पंख ही तो होते हैं उसके, जिनकी सहायता से बालक अपनी बुलन्दियों की ऊँचे से ऊँची उड़ान भर पाता है। एक बुलन्द हौसला होतें हैं, अदम्य-शक्ति होते हैं और होते हैं एक आत्म-विश्वास, उसके लिये, उसके माता और पिता।  
आकाश को अपनी मुट्ठी में बन्द कर लेने की क्षमता होती है उसमें। ऊर्जा और शक्ति के स्रोत, सूरज को भी, गाल में कैद कर लेने की क्षमता होती है बाल-हनुमान में। अदम्य शक्ति और ऊर्जा के स्रोत सूरज और चन्दा तो मात्र खिलौने ही होते हैं बाल-कृष्ण और बाल-हनुमान के लिये।
क्योंकि ऊर्जा और शक्ति का अविरल स्रोत होता है उसके साथ, उसके पास, उसके माता और पिता।
शिव और शक्ति के इर्द-गिर्द ही तो परिक्रमा करते रहते हैं बाल-गणेश और उनकी कृपा मात्र से ही तीनों लोकों में वन्दनीय हो जाते हैं, पूजनीय हो जाते हैं और प्रथम-वन्दन के योग्य हो जाते हैं बाल-गणेश।
इस उपन्यास में पाखी हर घटना का मुख्य पात्र है। उपन्यास की हर घटना पाखी के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती है। पाखी के पिता सीबीआई अफसर भास्कर भट्ट जी की भ्रष्टाचारी और असमाजिक तत्वों के द्वारा हत्या करा दी जाती है। पाखी किस प्रकार से समाज और कानून की व्यवस्था से लड़ कर उन्हें दण्डित कराती है, अत्यन्त रोचक घटना बन पड़ी है।
पर कटी हुई खून से लथपथ घायल चिड़िया का आकाश से पाखी की छत पर, उसके पास गिर जाने की घटना, पाखी के मन को विचलित कर देती है। फड़फड़ाती हुई बेदम चिड़िया के खून को अपने दुपट्टे से साफ कर, वह दौड़ पड़ती है अपने डॉक्टर अंकल के दवाखाने की ओर, उसका इलाज कराने के लिये, उसके जीवन को बचाने के लिये।
पाखी ने चिड़िया को बचा तो लिया, पर अब बिना पंख के ये बेचारी *पर-कटी चिड़िया* कैसे जी पायेगी अपनी जिन्दगी के शेष दिनों को। कौन है इसका आत्मीय-जन, जो इसे जीवन-भर दाना-पानी देता रहेगा और इसकी इसके ही समाज के चील, बाज़, गिद्ध आदि से पल-पल रक्षा करता रहेगा। ये तो अपनी रक्षा भी नहीं कर सकेगी अपने आप।  
कोई पैसे वाली बड़ी आसामी रही होती तो पैसे के पंख लगाकर उड़ लेती। कोई चार्टर-प्लेन ही ले लेती और अपने घर पर ही लैंडिंग की सुविधा भी बना लेती। आगे-पीछे घूमने वाले हजारों नौकर-चाकर भी मिल जाते इसको। और अपनी जिन्दगी के शेष दिनों को भी बड़े ऐश और आराम के साथ पसार भी कर लेती यह। पर अब, पैसे के बिना कृत्रिम-पंख भी तो नहीं लगवा सकती यह।
बिना पंख के तो ये *पर-कटी* अपने बच्चों के पास तक भी नहीं पहुँच सकती और कोमल बाल-पंख इतने शक्तिशाली कहाँ, जो उड़कर इसके पास तक आ भी सकें। अभी तो उन्हें ढंग से बैठना भी नहीं आता। ये तो अपने बच्चों के लिये दाना लेने ही आई थी और पंख देकर यहीं की होकर रह गई।
*पर-कटी चिड़िया* की आँखों में पाखी को अपना ही प्रतिविम्ब तो दिखाई दे रहा था। सब कुछ तो समान था दोनों में । दोनों ही नारी जाति के थे, दोनों का ही एक-एक पंख कटा हुआ था, दोनों ही शोषित-वर्ग से थे और संयोग-वश नाम भी तो दोनों का एक ही था। और वह नाम था पाखी। हाँ, *पाखी*, *पर-कटी पाखी*।  
      फर्क बस इतना था कि एक नभ-चर प्राणी था और दूसरा थल-चर प्राणी। एक आकाश में उड़ता था और दूसरा आकाश में उड़ने के सपने देखता था। और आज एक निष्ठुर पतंग-बाज और स्वार्थी-समाज ने वह फर्क भी मिटा दिया। आज दोनों के दोनों ही धरती के प्राणी होकर रह गये हैं, धरती पर आ गये हैं। आकाश में उड़ने के अपने स्वर्णिम सपनों को सदा-सदा के लिये तिलांजली देकर।
बाल-मन निर्मल, पावन और कोमल ऋषि-मन होता है। बालक तो निश्छल और निःस्वार्थ भाव से प्रेम करते हैं। और प्रेम ही तो मोह का मूल कारण होता है। बन्धन में बाँध लेता है भावुक भोले-मन को।
राजा दिलीप ने भी नन्दिनी की गौ-सेवा इतनी तन्मयता और तत्परता के साथ नहीं की होगी जितनी सेवा-सुश्रुषा पाखी ने अपनी पर-कटी चिड़िया की की। राजा दिलीप का तो स्वार्थ था, पर पाखी का तो क्या स्वार्थ।
बन्द पिंजरे में तोते पाखी को बिलकुल भी नहीं रास आते। वह पलक से उन्हें छोड़ने का आग्रह करती है। वह पक्षी बचाओ अभियान का संचालन करती है और *पाखी हित-रक्षक समिति* का गठन भी करती है।
इस उपन्यास की हर घटना सभी वर्ग के पाठकों को चिन्तन और मनन करने के लिये विवश करेगी। बालकों में संस्कार-सिंचन और युवा-वर्ग का पथ-प्रदर्शन कर उन्हें एक नई दिशा देगी। ऐसा मेरा विश्वास है। अस्तु।
 आनन्द विश्वास
सी-85 ईस्ट एण्ड एपार्टमेंटस्
न्यू अशोक नगर मेट्रो स्टेशन के पास
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