Friday, 15 August 2014

*हम बच्चे हिन्दुस्तान के.*


*हम बच्चे हिन्दुस्तान के.*
...आनन्द विश्वास



हम     बच्चे     हिन्दुस्तान  के।
हम     बच्चे    हिन्दुस्तान   के।
शीश   झुकाना  नहीं  जानते,
शीश   कटाना    ही   जाना।
मेरा  मजहब  मुझको  प्यारा,
पर  का  मजहब  कब  माना।
गोविन्द  सिंह के  वीर  सिंह,
हम  पले  सदा  तलवारों  में।
अपने   बच्चे   चिनवा   डाले,
जीते      जी     दीवारों    में।
रग-रग    में   है  स्वाभिमान,
हम   चलते  सीना  तान   के।   
हम     बच्चे    हिन्दुस्तान  के।
सागर   हमसे   थर-थर कांपे,
पर्वत   शीश    झुकाता    है।
तूफानों   की  राह  मोड़ कर,
वीर    सदा    मुस्काता    है।
राणा  सांगा के  हम वंशज,
और   शिवा  के  हम   भाई।
परवशता   की   बेड़ी  काटी,
और   घास  की  रोटी  खाई।
स्वाभिमान की जलती ज्वाला,
हम   जौहर    राजस्थान   के।
हम     बच्चे     हिन्दुस्तान  के।
गौतम   गाँधी  के  हम साधक,
विश्व    शांति    के  अनुयायी।
मानवता    के  लिए    जियेंगे ,
राजघाट   पर    कसमें   खाईं।
इंगलिश  भारत  माँ  के  गहने,
हिंदी   है    माता   की   बिंदी।
गुजराती  परिधान  पहन  कर,
गाना    गाते    हम      सिंधी।
शांति - दूत हम  क्रांति - दूत,
हम   तारे   नील  वितान   के। 
हम     बच्चे      हिन्दुस्तान के।

                                               ... आनन्द विश्वास

Friday, 16 May 2014

चिड़िया फुर्र...

चिड़िया फुर्र...
...आनन्द विश्वास
अभी दो चार दिनों से देवम के घर के बरामदे में चिड़ियों की आवाजाही कुछ ज्यादा ही हो गई थी। चिड़ियाँ तिनके ले कर आती, उन्हें  ऊपर रखतीं और फिर चली जातीं दुबारा, तिनके लेने के लिये।
लगातार ऐसा ही होता, कुछ तिनके नीचे गिर जाते तो फर्श गंदा हो जाता। पर इससे चिड़ियों को क्या? उनका तो निर्माण का कार्य चल रहा है, नीड़ निर्माण का कार्य। उन्हें गन्दगी से क्या लेना-देना।
नये मेहमान जो आने वाले हैं। और नये मेहमान को रहने के लिये घर भी तो चाहिये न? आखिर एक छत तो उनको भी चाहिये, रहने के लिये। पक्षी हैं तो क्या हुआ? उड़ना बात अलग है, चाहे कितना भी ऊँचा उड़ लिया जाय, पर रहने के लिये, आधार तो सबको ही चाहिये।
और फिर इनकी दुनियाँ में तो सब कुछ सेल्फ-सर्विस ही होता है। सब कुछ खुद ही तो करना होता है इन्हें। कोई नौकर नहीं, कोई मालिक नहीं। सब अपने मन के राजा और सब अपने मन के गुलाम।
देवम जब भी बरामदे में आता तो उसे कचरा पड़ा दिखाई देता। ऐसा कई बार हुआ। पर जब उसने ऊपर की ओर देखा तो उसे ख्याल आ गया कि ये तिनके तो चिड़ियाँ बार-बार ला कर ऊपर रख रहीं हैं और वे ही तिनके नीचे गिर जाते हैं। और घर गंदा हो जाता है।
गन्दगी तो देवम को विल्कुल भी रास नहीं आती। कभी काम वाली से तो कभी खुद, साफ-सफाई करते-करवाते देवम हैरान परेशान हो गया।
उसने मम्मी से शिकायत के लहज़े में कहा, मम्मी, ये चिड़ियाँ तो घर को कितना गंदा करतीं हैं, देखो ना?  
मम्मी को समझने में देर न लगी। उन्होंने देवम को समझाते हुए कहा, बेटा, ये अपना घर बना रहीं हैं और जब घर बनता है तो थोड़ी बहुत गंदगी तो हो ही जाती है। ला मैं साफ कर देती हूँ। कुछ दिनों के बाद देखना छोटे-छोटे बच्चे जब चीं-चीं करके उड़ेंगे तो बड़े प्यारे लगेंगे।
ऐसा माँ? देवम ने आश्चर्यचकित हो कर पूछा।
 “ हाँ बेटा, छोटे-छोटे मेहमान आयेंगे अपने घर में। मम्मी ने बड़े प्यार से देवम को समझाया।
देवम के मन में आतुरता जागी, छोटी-छोटी चिड़ियाँ के पास कहाँ से, कैसे आ जाते हैं छोटे-छोटे प्यारे बच्चे? अब तो उसके मन में बस प्रतीक्षा थी कि कब वह प्यारे-प्यारे बच्चों को देख सकेगा?
अब तो उसे उनके प्रति सहानुभूति हो गई थी । नीचे पड़े हुए तिनकों को पहले तो वह कचरा मान कर बाहर फैंक दिया करता था। पर अब तो सब के सब तिनके उठा कर, जब चिड़िया बाहर गई होती, तो चुपके से टेबल के ऊपर चढ़कर घोंसले के पास रख देता। और इस तरह रखता कि चिड़िया को पता न लगे। गुप्तदान की तरह गुप्त सहयोग।
सहयोग और सहानुभूति की प्रबल इच्छा होती है बालकों में। बस यह सोच कर कि जितनी जल्दी घर बन जायेगा, उतनी ही जल्दी बच्चे भी आ जायेंगे। और कभी-कभी तो वह बाहर से गार्डन में पड़े तिनकों को खुद ही उठा कर ले आता और टेबल पर चढ़ कर घौंसले के पास रख देता।
और जब उन तिनकों को चिड़ियाँ नहीं लेतीं, तो कभी तो बोल कर, तो कभी इशारे से वह कहता, ये तिनके भी ले लो न। ये भी तुम्हारे लिये ही हैं। पर दोनों एक दूसरे की भाषा समझें, तब न।
देवम रोज सुबह घोंसले की ओर देखता, और फिर निराश मन से मम्मी से पूछता, मम्मी, कितने दिन और लगेंगे बच्चों के आने में?
एक ऐसा प्रश्न जिसका उत्तर किसी के पास न था और वैसे भी बच्चों के प्रश्नों का उत्तर देना इतना आसान भी तो नहीं होता। हर कोई बीरबल तो होता नहीं है।
देवम को समझाते हुए मम्मी ने कहा, बेटा, ये सब तो भगवान की मर्जी है, जब वे चाहेंगे तब तुरन्त भेज देंगे।
 पर कब होगी भगवान की मर्जी? इतने दिन तो हो गये हैं।देवम ने उलाहना देते हुए कहा। जैसे कि वो भगवान की शिकायत कर रहा हो। बच्चों के लिये तो माँ, किसी भगवान से कम नहीं होतीं।
शायद देवम की बात भगवान को सुनने में देर न लगी और दूसरे दिन सुबह-सुबह ही घोंसले से चीं-चीं की आवाज सुनाई दी। घोंसले के अन्दर वातावरण गर्मा गया था। चहल-पहल बढ़ गई थी। शायद देवम की प्रार्थना भगवान ने सुन ली थी। उसकी इच्छा पूरी हो गई थी और चिड़िया ने बच्चों को जन्म दे दिया था।
देवम को जब पता चला तो खुशी के मारे फूला नहीं समाया। दौड़ा-दौड़ा वह मम्मी के पास पहुँचा और खुशी का समाचार सुनाया।
वह बोला, मम्मी, घोंसले से चीं-चीं की आवाज आ रही है, सुनो न।
मम्मी ने देवम को समझाया, एक दो दिन बाद जब बच्चे बाहर निकलेंगे तब दिखाई देंगे। तब तक तो इन्तजार करना ही होगा। ” 
मम्मी, मैं अभी ऊपर चढ़ कर देख लूँ तो? देवम ने उत्सुकता वश पूछा।
न बेटा, चिड़िया नाराज़ हो जायेगी और घर छोड़ कर कहीं दूसरी जगह चली जायेगी। मम्मी ने देवम को समझाते हुए कहा।
तो फिर क्या करूँ ? मम्मी। देवम का प्रश्न था।
बस एक दो दिन में बच्चे खुद ही बाहर आ जायेंगे। मम्मी ने बाल-मन को समझाते हुए कहा।
ठीक है, मम्मी। जब बाहर आयेंगे तभी देख लूँगा देवम ने अपने मन को समझाते हुये कहा।
एक-एक पल का इन्तज़ार जिसके लिए बेहद मुश्किल हो, दो दिन कैसे बिताये होंगे, ये तो देवम ही जाने। पर आज चिड़िया के बच्चों ने घोंसले से बाहर अपना मुँह निकाला और वो भी तब जब कि चिड़िया दाना लेने बाहर गई हुई थी।
 शायद अधिक देर हो जाने के कारण, बेटों को माँ की चिन्ता हुई होगी या फिर भूख अधिक लगने के कारण उनकी व्याकुलता बढ़ गई हो ?
खैर, कारण जो भी हो, पर देवम की शिशु-दर्शन की तमन्ना आज पूर्ण हो गई। छोटे-छोटे बच्चों को आज उसने जी भर कर देखा। और इसी अन्तराल में चिड़िया भी वहाँ आ पहुँची।
बच्चों का चीं-चीं करके मुँह खोलना और चिड़िया का मुँह में दाना डालना। दिव्य-दृश्य देवम ने निहारा। गद्-गद् हो गया उसका आतुर मन।
छोटे-छोटे बच्चे कभी घोंसले से बाहर की ओर मुँह निकाल कर अपनी माँ का इन्तजार करते और कभी जब माँ दिखाई दे जाती तो चीं-चीं कर के उसे बुलाते। देवम यह सब कुछ देख कर बड़ा खुश होता।
कभी तो थाली में ज्वार का दाना रख कर दूर हट जाता और दूर खड़े हो कर चिड़िया का इन्तजार करता। उसे तो उस क्षण का इन्तजार रहता जब चिड़िया दाना ले कर अपने छोटे-छोटे बच्चों के मुँह में दाना डाले।
इस क्षण की अनुभूति ही देवम को बड़ी अच्छी लगती। और इसी क्षण की प्रतीक्षा में वह घण्टों घोंसले से दूर इन्तजार करता।
छोटे बच्चों का घोंसले के बाहर निकलना, पंखों को फड़फड़ाना और उड़ने का प्रयास करना, अब तो आम बात हो गई थी। पर देवम की आत्मीयता में कोई भी कमी नही आई थी। वह उनका पूरा ख्याल रखता।
कभी-कभी तो वह छोटी थाली में दाना डाल कर, टेबल पर चढ़ कर थाली को ही घोंसले के पास रख देता। और दूर खड़ा हो गतिविधियों का निरीक्षण करता।
एक दिन देवम ने देखा कि एक बिल्ली टेबल पर रखे सामान के ऊपर चढ़ कर घोंसले तक पहुँचने का प्रयास कर रही है। उसे समझते देर न लगी कि बिल्ली तो बच्चों को नुकसान पहुँचा सकती है। उसने बिल्ली को तुरन्त भगाया और मम्मी को बताया।
मम्मी ने पायल की मदद से टेबल पर रखे सामान को वहाँ से हटा कर टेबल को भी उस जगह से हटा कर दूसरी जगह रख दिया। और साथ ही ऐसी व्यवस्था कर दी कि घोंसले के पास तक बिल्ली न पहुँच सके।
अब उसे ख्याल आ गया कि बिल्ली कभी भी चिड़िया के बच्चों को नुकसान पहुँचा सकती है और उनकी रक्षा करना उसका पहला कर्तव्य है। उसने निश्चय किया कि वह अपना अधिक से अधिक समय बरामदे में ही बिताएगा।
अपने पढ़ने की टेबल-कुर्सी भी उसने बरामदे में ही रख ली। और तो और डौगी को भी पिलर से बाँध दिया ताकि बिल्ली घोंसले के आसपास भी न फटक सके। अब तो उसकी पढ़ाई भी बरामदे में ही होती।
शायद राजा दिलीप ने इतनी सेवा नन्दिनी की नहीं की होगी, जितनी सेवा देवम ने चिड़िया और उनके बच्चों की, की। राजा दिलीप का तो स्वार्थ था। पर देवम का क्या स्वार्थ, उसे तो बस सेवा करने में अच्छा लगता है। बच्चों का प्रेम तो निश्छल होता हैं, उनका प्रेम तो निःस्वार्थ भावना से भरा होता है। छल और कपट से परे, भगवान का वास होता है उनके पावन मन-मन्दिर में।
और इस तरह एक सप्ताह ही बीता होगा कि एक दिन देवम ने देखा कि घोंसले में न तो चिड़िया थी और ना ही बच्चे। चिड़िया-फुर्र और घोंसला खाली।
एक दिन और इन्तजार किया, शायद रास्ता भूल गये हों। पर वे नहीं आये तो नहीं ही आये। चिड़िया और बच्चे उड़ कर जा चुके थे।
बाल-मन उदास हो गया। प्रेम की डोर ही कुछ ऐसी ही होती है। जब टूटती है तो दुख तो होता ही है।
उसने मम्मी से बड़े ही उदास मन से कहा, मम्मी, चिड़िया तो बच्चों के साथ कहीं उड़ गई। अब घोंसला तो खाली पड़ा है।
अच्छा ! चिड़िया फुर्र हो गई ? चलो, अच्छा हुआ और दूसरी आ जायेगी। मम्मी ने जानबूझ कर वातावरण को हल्का करते हुए कहा।
  नहीं मम्मी, मुझे चिड़िया के बच्चे अच्छे लगते थे। देवम ने दुखी मन से कहा।
पर उनको जहाँ अच्छा लगेगा, वहीं तो वे रहेंगे। मम्मी ने देवम को समझाया।
मैं तो उनका कितना ध्यान रखता था फिर भी चले गये। देवम ने शिकायत भरे लहज़े में कहा और कहते-कहते आँसू छलक पड़े।
कैसे समझाये मम्मी, जिन्दगी के इस गूढ रहस्य को।  बच्चे प्यारे होते हैं, वे निश्छल और निःस्वार्थ प्रेम करते हैं। और प्रेम ही तो मोह का मूल कारण होता है। बन्धन में बाँध लेता है भोले मन को।
जो आया है उसे एक न एक दिन तो जाना ही होता है। बालक को समझाना कितना मुश्किल होता है, ये तो देवम की मम्मी ही जाने। माँ से ज्यादा अच्छा और कौन समझा सकता है ? और समझ सकता है अपने बालक को ?
पर यह सत्य है एक न एक दिन तो हम सबको ही फुर्र हो कर कहीं उड़ जाना है और घोंसले को तो यहीं का यहीं रह जाना है। फिर मोह कैसा ?  पर फिर भी, मोह तो होता ही है। आँखें तो भर ही आती हैं।
मम्मी ने देवम को समझाते हुए कहा,   बेटा, जब तेरे पापा छोटे थे तो पापा की मम्मी, पापा को दूध पिलाती थी, खाना खिलाती थी और गाँव में रहते थे।
ऐं मम्मी ! ”  देवम को आश्चर्य भी हुआ और हँसी भी आई।
हाँ और सुन, फिर पापा बड़े हो गये, उनकी नौकरी यहाँ शहर में लगी, तो फुर्र होकर गाँव से शहर आ गये। ऐसा कहते हुए मम्मी ने एलबम में से अपनी बचपन की एक फोटो दिखाई।
ये तो मम्मी फ्रॉक पहने हुए कोई छोटी सी लड़की  बैठी है ।   देवम ने फोटो देख कर कहा।
 “ पहचान, ठीक से पहचान। ये तो मैं हूँ मम्मी ने देवम की जिज्ञासा बढ़ाई।
पहले ऐसी थीं मम्मी आप ? देख कर देवम को हँसी आ गई।
हाँ, पहले ऐसी थी मैं, फिर बड़ी हो गई, शादी हुई और फिर फुर्र होकर मैं तेरे पापा के पास आ गई। मम्मी ने देवम को समझाया।
पहले तो देवम हँसा फिर बोला,   फिर तो मम्मी, मैं भी बड़ा हो कर पापा जैसा हो जाऊँगा ?
हाँ बेटा, अभी तू पढ़ेगा, फिर जहाँ तेरी नौकरी लगेगी वहीं तू भी फुर्र होकर चला जायेगा। तेरी भी सुन्दर- सी बहू फुर्र हो कर तेरे पास आ जायेगी। मम्मी ने देवम को गुदगुदाया।
अच्छा मम्मी, मैं अभी फुर्र हो कर दूसरे कमरे में हो कर आता हूँ और आप मेरे लिये किचिन में से फुर्र होकर ठंडा-ठंडा पानी ले आओ। मुझे बड़ी जोर से प्यास लगी है देवम ने कहा।
और जब एक प्यास बुझ जाती है तो दूसरी प्यास लगा ही करती है, ऐसा प्रकृति का नियम ही है। शायद देवम की समझ में भी कुछ आ गया होगा।
वह समझ गया था कि भगवान ने पक्षियों को उड़ने के लिये पंख दिये हैं तो वे उड़ेंगे ही। स्वच्छंद असीम आकाश में। पक्षी तो आकाश की शोभा हैं न कि बन्द पिंजरों की।
उधर देवम के पापा ने यह सोच कर कि देवम का मन लगा रहेगा और चिड़िया के बच्चों से मन हट जायेगा, बाजार से दो तोते पिंजरों के साथ मँगवा दिये। और जहाँ घोंसला था उसी के नीचे दोनों पिंजरे टँगवा दिये। खाना और पानी की भी पूरी व्यवस्था भी करवा दी।
देवम ने तोतों को देखा तो आश्चर्य हुआ। पर उसे अच्छा नहीं लगा।
उसने पापा से कहा, पापा, इन तोतों को उड़ा दें तो कितना अच्छा रहेगा ? आकाश में उड़ते हुये ये कितने सुन्दर लगेंगे ?
हाँ, पर तुम जैसा उचित समझो ? पापा ने कहा। चाहते तो पापा भी यही थे। पर कभी-कभी सन्तान की खुशी के लिये माता-पिता को वह काम भी करना पड़ता है जिसे वे नहीं चाहते हैं। पर उनका प्रयास बच्चों को सही दिशा दिखाने  का अवश्य ही रहता है।
देवम ने दोनों तोतों को खट्टी अमियाँ खिलाईं, पानी पिलाया और फिर पिंजरे के दरवाजे को खोल कर हँसते हुये कहा, तोते फुर्र..... तोते फुर्र...... तोते फुर्र.....।
और देखते ही देखते दोनों तोते पंख फड़फड़ाते हुए असीम आकाश में ओझल हो गए और शायद देवम का मन भी असीम आकाश सा विशाल हो गया था।
 और मम्मी खड़ी-खड़ी देवम की प्रसन्नता को निहार रहीं थीं।
फिर मम्मी को देख कर, हँसते हुये देवम ने मम्मी से कहा,  मम्मी, चिड़िया फुर्र...  तोते फुर्र...  फुर्र... फुर्र...
देवम ने दोनों पिंजरों को बड़ी बेरहमी से तोड़ डाला ताकि कोई दूसरा तोता इन पिंजरों में, कोई बन्द न कर सके।
और घोंसले को वहीं रखा रहने दिया ताकि कोई दूसरी चिड़िया इसमें आ कर रह सके।
पर भोले देवम को क्या मालूम कि इनके समाज में, ये लोग तो अपना घर खुद ही बनाते हैं। ये लोग किसी दूसरे के घर में नहीं रहते हैं। और तो और इनके यहाँ तो सब कुछ सैल्फ-सर्विस ही होता है।
देवम क्या जाने कि जब ये प्राण-पखेरू उड़ जाते हैं तो ये नश्वर शरीर किसी काम का नहीं रहता और ना ही इस नश्वर घोंसले में कोई प्राण, पुनः प्रवेश करता है। प्राण को परमात्मा से मिलने के लिए घोंसले से तो बाहर निकलना ही पड़ता है। ये चिड़िया फुर्र होकर ही तो अनन्त आकाश में विलीन हो जाती है। एक जगह विरह होता है तो दूसरी जगह मिलन भी तो होता है।
इस जरा सी बात को देवम क्या, हम भी नहीं समझ पाते हैं और चिड़िया के फुर्र होने पर वरबस आँखों से सागर छलक जाते हैं। गंगा-जमना बह जातीं हैं। मन उदास हो जाता है।
यही तो संसार का नियम है।

*****


Monday, 10 March 2014

*पीछे मुड़ कर कभी न देखो*

*पीछे मुड़ कर कभी न देखो*
(यह कविता मेरे काव्य-संकलन
*मिटने वाली रात नहीं*
से ली गई है।)
...आनन्द विश्वास

*पीछे मुड़ कर कभी न देखो*

पीछे  मुड़ कर कभी न देखो, आगे ही तुम  बढ़ते जाना,
उज्वल ‘कल’ है तुम्हें बनाना, वर्तमान ना व्यर्थ गँवाना।
संधर्ष आज  तुमको करना है,
मेहनत में  तुमको खपना है।
दिन और रात  तुम्हारे अपने,
कठिन  परिश्रम   में तपना है।
फौलादी  आशाऐं  लेकर, तुम लक्ष्य प्राप्ति करते जाना,
पीछे  मुड़ कर कभी न देखो, आगे ही तुम बढ़ते जाना।
इक-इक पल है  बहुत कीमती,
गया समय  वापस  ना आता।
रहते  समय    जागे तुम तो,
जीवन  भर  रोना रह  जाता।
सत्यवचन सबको खलता है मुश्किल है सच को सुन पाना
पीछे  मुड़ कर कभी  न देखो, आगे  ही तुम  बढ़ते जाना।
बीहड़  बीयावान   डगर  पर,
कदम-कदम  पर  शूल मिलेंगे।
इस   छलिया  माया नगरी में,
अपने   ही   प्रतिकूल   मिलेंगे।
गैरों की तो बात छोड़ दो, अपनों से मुश्किल बच पाना,
पीछे  मुड़ कर कभी न देखो, आगे  ही तुम बढ़ते जाना।
कैसे  ये    होते    हैं   अपने,
जो सपनों को तोड़ा करते हैं।
मुश्किल में हों आप अगर तो,
झटपट  मुँह  मोड़ा  करते  हैं।
एक ईश जो साथ तुम्हारे, उसके तुम हो कर रह जाना,
पीछे  मुड़ कर कभी न देखो, आगे ही  तुम बढ़ते जाना।
...आनन्द विश्वास

Saturday, 8 March 2014

*अबोध बालक*

देवम का घर स्कूल से थोड़ी ही दूरी पर है। वह अक्सर अपने साथियों के साथ पैदल या कभी-कभी साइकिल से स्कूल आया-जाया करता है। और जब कभी पापा के पास समय होता तो वे स्कूटर या कार से उसे स्कूल छोड़ देते और आते समय वह पैदल ही अपने साथियों के साथ वापस आ जाता।
शाम को देवम स्कूल के मैदान में फुटबॉल खेलने जाता, वह स्कूल की टीम में भी खेलता। शाम को देवम के स्कूल में पी.टी. सर अपनी देख-रेख में सभी खिलाड़ियों को खिलाते और प्रशिक्षण भी देते। देवम का यह नित्य का नियम है शाम हुई नही कि देवम स्कूल के मैदान पर।
देवम हॉकी, फुटबॉल तथा क्रिकेट बहुत अच्छा खेलता, स्कूल के सभी शिक्षक, छात्र उसका सम्मान भी करते। और जब कभी भी देवम की टीम जीतती तो उसमें देवम का योगदान अवश्य होता। देवम अपनी स्कूल की फुटबॉल टीम का कैप्टिन भी है।
आज स्कूल में फुटबॉल के टूर्नामेंट का फाइनल मैच सौरभ विद्यालय से है। स्कूल में काफी दर्शक और स्कूल के छात्र भी आये हुये है।
शहर के नेशनल डिग्री कॉलेज के प्राचार्य डॉ. राजेश गौड़ अतिथि-विशेष के रूप में आये थे। जो यूनिवर्सिटी स्पोर्टस् कमेटी के सदस्य भी हैं और किसी समय वे अच्छे खिलाड़ी भी रहे थे।
देवम के स्कूल की टीम ने सौरभ विद्यालय की टीम को दो गोल से हरा कर शील्ड जीत ली। जिसमें एक गोल देवम ने और दूसरा गोल उसके साथी राहुल ने किया।
सभी दर्शक देवम और राहुल के खेल की बहुत-बहुत तारीफ़ कर रहे थे। जिनके पासिंग कम्बीनेशन से ही गाँधी विद्यालय जीत सका। अतिथि विशेष को भी देवम और राहुल का खेल बहुत पसंद आया। अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने देवम और राहुल के खेल की प्रशंसा भी की थी।
जीतने वाले तथा हारने वाले दोनों टीम के सभी खिलाड़ियों को अतिथि-विशेष के द्वारा पुरस्कार का वितरण किया गया और शील्ड गाँधी विद्यालय के कैप्टिन देवम और साथी खिलाड़ियों को प्रदान की गई। शाम का समय हो चुका था। खेल खत्म होने के बाद देवम और उसके साथी पैदल ही अपने घर की ओर आ रहे थे।
इन्हीं के साथ कुछ बच्चे भी खेलते-खेलते मस्ती में चल रहे थे। शायद वे कुछ खेल के मूड में रहे होंगे, वे पत्थर उठा कर थोड़ी दूर पड़े, दूसरे पत्थर को मार कर अपना निशाना लगा रहे थे। और इस प्रकार शर्त लगा कर वे कभी जीतते तो कभी हारते, और अपने घर की ओर बढते जा रहे थे।
उसमें से एक ने कहा- अच्छा सामने उस पत्थर पर निशाना लगा। और फिर दूसरे ने पत्थर हाथ में लेकर निशाना मारा। पत्थर ठीक लक्ष्य पर लगा। अच्छा, चल तेरे सात पोइंट हो गये।
अच्छा, चल अब तू उस विजली के खम्भे पर निशाना लगा। और इस बार फिर निशाना सही बैठा, इस पर दूसरे का एक पोइंट और बढ़ गया। और अब इस बार लक्ष्य था सड़क के दूसरी ओर खड़े टेलीफोन के खम्भे का।
दोनों के हाथ में पत्थर थे और अर्जुन की भाँति लक्ष्य की ओर निशाना। उन्होने सड़क के दूसरी ओर खड़े टेलीफोन के खम्भे की ओर पत्थर फेंके।
पत्थर हाथों से निकल चुके थे, तभी तेजी से दौड़ती हुई जीप सड़क पर गुजरी और पत्थर जीप-चालक के सिर पर जा लगा।
एक जोरदार चीख के साथ ही ड्राइवर जीप का सन्तुलन खो बैठा। और असंतुलित जीप, साइकिल को रौंदती हुई, स्कूटर को टक्कर मार कर सड़क के किनारे खड़ी बस से जा टकराई।
जीप में बैठे हुये पुलिस के दारोगा तथा तीन सिपाहियों को काफी चोट लगी। बड़ी मुश्किल से जीप में फँसे लोगों बाहर निकाला गया। काफी लोग लहू-लुहान हो गये थे।
साइकिल पर स्कूल का ही छात्र राहुल था। जो स्कूल से मैच खेल कर घर वापस जा रहा था। उसकी साइकिल के ऊपर से जीप का अगला पहिया निकला गया था और राहुल को भी बहुत चोट आई। वह बेहोश हो  गया था और चल भी नहीं सकता था।
राहुल, गाँधी विद्यालय का छात्र और देवम का परम मित्र भी। देवम और राहुल दोनों एक ही कक्षा में पढ़ते थे। राहुल स्कूल टीम में मैच खेल कर वापस घर जा रहा था। एक गोल उसने भी किया था।
अपने साथी राहुल को घायल अवस्था में देख कर देवम एक पल के लिये तो किं कर्तव्यम् विमूढ ही हो गया और दूसरे क्षण ही उसने त्वरित निर्णय लेते हुये अपने दो साथी विजय और आकाश से कहा कि तुम तुरन्त इसकी सूचना स्कूल में जाकर आरती मैडम को दो और मैं राहुल को ले कर अस्पताल पहुँच रहा हूँ।
इधर दो तीन लोगों की सहायता से देवम ने राहुल को रिक्शे में बैठा कर अस्पताल ले जाने की व्यवस्था की। कुछ लोग कहने लगे कि पहले पुलिस केस करना पड़ेगा फिर अस्पताल ले जाना सम्भव होगा।
पर देवम ने इन लोगों की एक न सुनी और राहुल को अस्पताल पहुँचा कर तुरन्त ही इलाज की व्यवस्था करवाई। अस्पताल के डॉक्टर देवम के पापा के परम मित्र थे अतः बहुत कुछ समस्या अपने आप ही हल हो गई।
और जब देवम ने डॉक्टर अंकल को बताया कि राहुल उसका परम मित्र है तो फिर इलाज की पूरी व्यवस्था डॉक्टर अंकल ने अपनी देख-रेख में ही की।
राहुल की अस्पताल में व्यवस्था कर देवम ने राहुल के घर जाकर सूचना दी और राहुल की माँ को अपने साथ लेकर वापस अस्पताल आ गया। राहुल की माँ का रोते-रोते बुरा हाल हो गया था। पर होनी को कौन टाल सकता है ? आदमी इसके आगे विवश हो जाता है।
उधर घटना-स्थल पर देखते ही देखते हजारों की संख्या में भीड़ इकट्ठी हो गई। सारे शहर में हर जगह यही चर्चा थी कि गांधी विद्यालय के छात्र का जीप से एक्सीडेंट हो गया। जो सुनता, घटना-स्थल की ओर दौड़ पड़ता।
इसी अंतराल में पत्थर फेंकने वाले बच्चों का तो पता नहीं, किधर भाग गये। उन्हें किसी ने नहीं देखा और आम पब्लिक तो यह ही समझ रही थी कि पुलिस वाला जीप ड्राइवर गाड़ी का सन्तुलन खो बैठा जिसकी वजह से ऐक्सीडेन्ट हो गया। इसी कारण से भीड़ में पुलिस के प्रति क्रोध और आक्रोश व्याप्त था। सभी लोग पुलिस की आलोचना ही कर रहे थे।
पुलिस स्कूल के दो छात्र आलोक और अजय, जो कि आकाश के आगे-आगे चल रहे थे, को पकड़ कर थाने ले गई है। पुलिस का कहना था कि इन लड़कों ने ही जीप पर पत्थर फेंके थे जिस कारण दुर्घटना हुई।
जबकि पत्थर के विषय में इन्हें कुछ भी जानकारी नहीं थी। वे तो मैच के बारे में बातचीत करते हुऐ फुटपाथ पर चल कर अपने घर की ओर आ रहे थे।
उधर स्कूल में आरती मैडम को आकाश और विजय ने घटना के विषय में बताया तो वे पी.टी. सर और उन छात्रों को साथ ले कर घटना-स्थल पर पहुँची।
घटना स्थल पर पता चला कि पुलिस स्कूल के दो छात्र आलोक और अजय को पकड़ कर थाने ले गई है और उन पर आरोप था कि इन छात्रों ने पत्थर फेंक कर ड्राइवर को घायल कर दिया, जिस कारण दुर्घटना हुई।  यह खबर हवा की तरह पूरे शहर में फैल गई।
 तुरन्त ही प्रिंसीपल आरती मैडम, पी.टी.सर, विजय और आकाश थाने पहुँचे और उनके पीछे-पीछे था, अपार जन-समुदाय।
सभी लोगों में पुलिस के इस बेहूदे आचरण के प्रति आक्रोश ही नहीं प्रतिशोध भी था। वे पुलिस विरोधी नारे भी लगा रहे थे।
प्रिंसीपल आरती मैडम ने थानेदार को समझाया और आश्वासन दिया कि ये बच्चे इस तरह का काम कभी भी नहीं कर सकते।
कोई और कारण रहा होगा, इन बच्चों को घटना के विषय में कोई भी जानकारी नहीं है। ये दोनों छात्र हमारे स्कूल के अनुशासित और अच्छे छात्र हैं।
थाने पर बढ़ती भीड़ और परिस्थिति को अपने विपरीत होते देख थानेदार ने आलोक और अजय को छोड़ देना ही उचित समझा।
आलोक और अजय को थाने से छुड़ा कर प्रिंसीपल आरती मैडम, पी.टी. सर और सभी छात्र तुरन्त अस्पताल पहुँचे। और साथ ही इस घटना की पूरी सूचना उन्होंने स्कूल संचालक श्री रामदयाल जी को दी और उनसे तुरंत अस्पताल पहुँचने का आग्रह किया।
जीप के ड्राइवर के खिलाफ भिन्न-भिन्न धाराओं के  अंतर्गत केस दर्ज कर लिया गया था। ड्राइवर को पुलिस ने अपनी कस्टडी में ले लिया था। पंचनामा हो गया था। कानून है, कानून तो अपना काम करेगा ही।
राहुल की माँ और उसके परिवार के लोग अस्पताल पहुँच चुके थे। राहुल की माँ का तो रोते-रोते बुरा हाल था। आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। प्रिंसीपल आरती मैडम ने राहुल की माँ को धैर्य बँधाया।
रामदयाल जी ने अस्पताल के अधिकारियों के साथ मिल कर शीघ्र ही अच्छे से अच्छे इलाज की व्यवस्था के लिये कहा तो डॉ. अविनाश ने कहा कि देवम ने यहाँ आ कर पहले ही से सब कुछ बता दिया है आप बिल्कुल भी चिन्ता न करें, राहुल का उपचार सही दिशा में चल रहा है। रामदयाल जी देवम के किये गये कार्यों से बड़े प्रसन्न हुये।
उधर घटना-स्थल पर बे-काबू हुई भीड़ को जब पता चला कि पुलिस स्कूल के दो छात्रों को पकड़ कर ले गई है तो भीड़ ने पुलिस की जीप को जला डाला और पुलिस के दमन विरोधी नारे लगाते हुये थाने की ओर चल पड़े।
भीड़ के केवल हाथ होते हैं और वे भी केवल विध्वंस करने वाले हाथ। वो कहाँ क्या कर बैठे किसी को पता नहीं होता। जगह-जगह उत्पात आगज़नी करते-करते भीड़ थाने पहुँच कर पत्थर मारी करने लगी। ऐसे में कुछ अवांछनीय तत्व भी इस भीड़ में शामिल हो गये।
लोगों ने थाने में घुस कर तोड़-फोड़ भी की। पुलिस के दमन कारी कृत्य के विरोध में जगह-जगह पर आगजनी की घटना होने लगी।
सी.आर.पी. और एस.आर.पी. की टुकड़ियाँ  बुलानी पड़ी। इतना ही नहीं कई जगह तो कर्फ्यू और धारा 144 भी लगानी पड़ी। तब कहीं जा कर शहर की व्यवस्था को कन्ट्रोल किया जा सका।
स्कूल के छात्र बहुत दुखी थे उनके प्रिय साथी राहुल का इलाज अस्पताल में हो रहा था। कोई दिन ऐसा नहीं जाता था, जिस दिन स्कूल के दस बारह साथी राहुल से मिलने अस्पताल में न आते हों।
देवम तो रोज़ ही राहुल से मिलने जाता और किसी चीज की जरूरत होती तो उसे दे कर भी आता था। स्कूल के टीचर्स और प्रिन्सीपल भी समय निकाल कर जरूर आते।
लगभग चार पाँच दिन के बाद आठवीं कक्षा के दो छात्र रोहन और सोहन फूल का एक गुच्छा ले कर अस्पताल राहुल से मिलने पहुँचे। उनकी आँखों में आँसू थे और मन में ग्लानि के भाव।
उन्होंने रो-रो कर राहुल को बताया कि उन्हीं के कारण उस की यह दशा हुई है। असल में हम दोनों का पत्थर ही ड्राइवर के लग गया था जिस कारण जीप का एक्सीडेंट हो गया था।
राहुल भैया, आप हमें माफ कर दो, वैसे तो हम आपसे माफी के लायक भी नहीं हैं, हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई। भविष्य में हम कभी भी ऐसा खेल नहीं खेलेंगे जिसके कारण किसी को कोई कष्ट हो। हमारी वजह से ही आपको बहुत कष्टों का सामना करना पड़ा।
राहुल ने दोनों साथियों को गले लगा लिया और माफ कर दिया। रोहन और सोहन के सिर से जैसे एक बहुत बड़ा  बोझ उतर गया था। लेकिन वे आँसू, आत्मग्लानि और अफसोस के बोझ से दबे जा रहे थे।
अब उन्हें एहसास हो रहा था कि एक छोटी सी नादानी, नासमझी कितना बड़ा अहित कर सकती है, कितने लोगों को कष्ट पहुँचा सकती है।
यहीं तक नही, जब पुलिस वालों को सत्य का पता चला तो उन्होंने भी देवम और राहुल से अपनी गलती के प्रति दुख और अफसोस व्यक्त किया।
   काश !  समय रहते हम अपने बच्चों को कुछ अच्छे संस्कार और अच्छी बातें सिखा पाते ! अच्छे संस्कार देना आखिर, हमारा ही तो कर्तव्य है।
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(यह कहानी मेरे बाल-उपन्यास "देवम बाल-उपन्यास" से ली गई है।)
-आनन्द विश्वास